भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई

राजा जनक के दूत मिथिला से चलकर अत्यंत तेज गति से अयोध्या पहुँचे। राजसभा में प्रवेश कर उन्होंने महाराज दशरथ को महर्षि विश्वामित्र का संदेश दिया और श्रीराम द्वारा शिव धनुष भंग करने का पूरा वृत्तांत विस्तार से सुनाया। अपने वीर पुत्र की इस असाधारण सफलता और राजा जनक द्वारा भेजे गए विवाह के प्रस्ताव को सुनकर महाराज दशरथ का हृदय आनंद से भर गया। उन्होंने तुरंत दूतों को ढेरों उपहार दिए और कुलगुरु वशिष्ठ से परामर्श कर मिथिला जाने की घोषणा कर दी।
अगले ही दिन, अयोध्या से एक अत्यंत विशाल और भव्य बारात ने मिथिला के लिए प्रस्थान किया। इस बारात में चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक), बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, और अयोध्या के विशिष्ट नागरिक शामिल थे। खजाने से भरे कई रथ दान-पुण्य के लिए साथ चल रहे थे। जब यह विशाल बारात मिथिला की सीमा पर पहुँची, तो राजा जनक अपने छोटे भाई कुशध्वज और मंत्रियों के साथ अगवानी के लिए खड़े थे। दोनों महान सम्राटों—दशरथ और जनक—का मिलन अत्यंत भावपूर्ण और ऐतिहासिक था। महाराज दशरथ ने जब विश्वामित्र के साथ गए अपने पुत्रों, राम और लक्ष्मण को देखा, तो वे प्रेम से गदगद हो गए और उन्हें गले लगा लिया।
विवाह के लिए एक अत्यंत भव्य मंडप सजाया गया था। शुभ मुहूर्त आने पर महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और शतानंद (जनक के कुलगुरु) ने वेदमंत्रों का उच्चारण आरंभ किया। राजा जनक ने अपनी सबसे बड़ी और प्रिय पुत्री सीता का हाथ श्रीराम के हाथ में सौंपते हुए वह प्रसिद्ध श्लोक कहा—
"इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव। प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना॥"
अर्थात: हे राम! यह मेरी पुत्री सीता है, जो आज से जीवन के हर धर्म में तुम्हारी सहचरी होगी। इसे स्वीकार करो और इसका पाणिग्रहण करो।
इसके पश्चात, राजा जनक ने अपनी दूसरी रूपवान पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण के साथ कर दिया। जनक के छोटे भाई राजा कुशध्वज की भी दो अत्यंत गुणवान पुत्रियां थीं। महर्षियों की आज्ञा से कुशध्वज की बड़ी पुत्री मांडवी का विवाह भरत से और छोटी पुत्री श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ।
चारों भाइयों का विवाह एक साथ होते देख देवता भी हर्षित हो उठे और आकाश से पुष्पों की निरंतर वर्षा होने लगी। अप्सराएं नृत्य करने लगीं और गंधर्वों ने मंगल गीत गाए। मिथिला नरेश जनक ने दहेज के रूप में असंख्य हाथी, घोड़े, रथ, दास-दासियां, स्वर्ण और आभूषण अयोध्या नरेश को भेंट किए।
कुछ दिन मिथिला में उत्तम सत्कार का आनंद लेने के बाद, विदाई की अत्यंत भावुक बेला आई। राजा जनक और महारानी सुनयना अपनी पुत्रियों को रथ में बैठाते समय फूट-फूट कर रो पड़े। पूरे मिथिला नगर की आंखों में अश्रु थे। अपनी राजकुमारियों और अयोध्या की बारात को विदा करके मिथिला वासी भारी मन से लौट आए।
मार्ग में सुरक्षित यात्रा करते हुए बारात जब अयोध्या पहुँची, तो पूरी नगरी को दुल्हनों के स्वागत के लिए स्वर्ग के समान सजाया गया था। अयोध्या की माताओं—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—ने राजद्वार पर आरती की थाल सजाकर अपनी चारों सुंदर बहुओं और पुत्रों का स्वागत किया। राजमहल खुशियों और उत्सव से गूंज उठा। ब्राह्मणों को दान दिए गए और प्रजा ने इस मांगलिक अवसर पर खूब जश्न मनाया।
विवाह के कुछ समय पश्चात, राजा कैकेय के पुत्र और भरत के मामा युधाजित अयोध्या आए। महाराज दशरथ की आज्ञा लेकर वे भरत और शत्रुघ्न को कुछ समय के लिए अपने साथ ननिहाल ले गए।
इधर अयोध्या में, श्रीराम और सीता अत्यंत सुखपूर्वक अपना दांपत्य जीवन व्यतीत करने लगे। श्रीराम अब केवल एक राजकुमार नहीं रह गए थे; वे अपने पिता दशरथ के राजकाज में भी हाथ बंटाने लगे थे। अपनी अद्भुत बुद्धिमत्ता, वीरता, सत्यवादिता और प्रजा के प्रति असीम प्रेम के कारण श्रीराम ने संपूर्ण अयोध्या वासियों के हृदय में एक गहरा और अटूट स्थान बना लिया था। महाराज दशरथ अपने सबसे बड़े पुत्र को इतना योग्य और लोकप्रिय होते देखकर मन ही मन एक बड़ा निर्णय लेने की ओर बढ़ रहे थे।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।
पढ़ें →भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण
श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।
पढ़ें →भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल
चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।
पढ़ें →भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा
महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।
पढ़ें →भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर
मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।
पढ़ें →भाग 7: राम के राज्याभिषेक की घोषणा और मंथरा की कुटिल चाल
महाराज दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की घोषणा की और पूरी अयोध्या उत्सव में डूब गई। किंतु दासी मंथरा ने कैकेयी के मन में ईर्ष्या का विष भर दिया और उसे कोपभवन भेज दिया।
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