अँधेरे की चीज़ उजाले में ढूँढना

सर्दियों की एक सर्द और अँधेरी रात थी। पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था। शेख चिल्ली किसी काम से अपने एक रिश्तेदार के घर से लौट रहा था।
रास्ते में एक बहुत ही संकरी और घनी 'अँधेरी गली' पड़ती थी। उस गली में इतनी कालिख छाई हुई थी कि इंसान को अपना हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। शेख चिल्ली उस गली से गुज़र रहा था, तभी अचानक उसकी जेब में रखा एक 'चाँदी का सिक्का' खिसक कर ज़मीन पर गिर गया।
'खनक!'
सिक्के के ज़मीन पर गिरने की आवाज़ शेख चिल्ली के कानों में पड़ी। वह तुरंत अपनी जगह पर रुक गया। "अरे! मेरा चाँदी का सिक्का गिर गया!" उसने बड़बड़ाते हुए कहा।
शेख चिल्ली ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और उस घुप अँधेरे में अपने हाथों से ज़मीन की मिट्टी टटोलने लगा। वह इधर-उधर हाथ मार रहा था, लेकिन अँधेरा इतना ज़्यादा था कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसने गली का कोना-कोना टटोल लिया, लेकिन सिक्का उसके हाथ नहीं लगा।
काफी देर तक अँधेरे में परेशान होने के बाद, शेख चिल्ली के दिमाग ने अपना अतरंगी काम करना शुरू किया।
उसने देखा कि उस गली से थोड़ा बाहर निकलकर, मुख्य सड़क के चौराहे पर नगर निगम का एक 'बड़ा सा खंभा' लगा है, जिस पर एक बहुत ही तेज़ रोशनी वाला 'लालटेन' जल रहा था। उस लालटेन की रोशनी में चौराहे का चबूतरा बिल्कुल दिन की तरह चमक रहा था।
शेख चिल्ली के दिमाग में एक बहुत ही 'शानदार' (और बेवकूफी भरा) विचार आया। उसने सोचा: "मैं भी कितना मूर्ख हूँ! मैं इस घुप अँधेरे में सिक्का ढूँढ कर अपना समय बर्बाद कर रहा हूँ, जहाँ कुछ दिखाई ही नहीं देता। मुझे तो अपना सिक्का उस खंभे की रोशनी में ढूँढना चाहिए, जहाँ सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है!"
यह सोचते ही शेख चिल्ली उस अँधेरी गली को छोड़कर, बाहर उस लालटेन के उजाले में आ गया। वह उस खंभे के बिल्कुल नीचे झुककर, बहुत ही ध्यान से ज़मीन की एक-एक ईंट को देखने लगा। वह ज़मीन पर लेट-लेट कर चौराहे को ऐसे छान रहा था जैसे सिक्का बस वहीं कहीं रखा हो।
कुछ ही देर में, गाँव के दो-तीन लोग उसी चौराहे से गुज़रे। उन्होंने देखा कि रात के इस पहर, शेख चिल्ली ज़मीन पर झुककर कुछ बहुत ही ज़रूरी चीज़ ढूँढ रहा है।
गाँव वाले भी बहुत मददगार थे। उन्होंने शेख के पास जाकर पूछा, "क्या हुआ शेख भाई? इतनी रात को इस रोशनी में ज़मीन पर क्या ढूँढ रहे हो? क्या कुछ कीमती चीज़ गिर गई है?"
शेख चिल्ली ने बिना अपनी नज़रें ज़मीन से हटाए जवाब दिया, "हाँ भाइयो! मेरा एक बहुत ही कीमती 'चाँदी का सिक्का' ज़मीन पर गिर गया है। मैं उसी को ढूँढ रहा हूँ।"
यह सुनकर गाँव वालों को भी दया आ गई। उन्होंने सोचा कि शेख बेचारा परेशान है, उसकी मदद करनी चाहिए। वे तीनों भी शेख चिल्ली के साथ उस लालटेन की रोशनी में झुक गए और चबूतरे का कोना-कोना छानने लगे।
पूरा आधा घंटा बीत गया। चारों ने मिलकर उस खंभे के नीचे की एक-एक इंच ज़मीन खंगाल ली, लेकिन कहीं कोई चाँदी का सिक्का नहीं मिला।
अंत में थक-हार कर एक गाँव वाले ने अपनी कमर सीधी की और पसीना पोंछते हुए पूछा, "अरे शेख! हमने तो यहाँ की सारी ज़मीन देख ली। सिक्का तो कहीं नज़र नहीं आ रहा। ज़रा ठीक से याद करके बताओ कि तुम्हारा सिक्का 'ठीक किस जगह' पर गिरा था? ताकि हम वहीं ढूँढें।"
शेख चिल्ली ने बहुत ही मासूमियत और शांति के साथ उस 'घनी अँधेरी गली' की तरफ अपनी उँगली का इशारा करते हुए कहा: "सिक्का तो असल में उस अँधेरी गली के बिल्कुल बीचों-बीच गिरा था।"
यह सुनते ही तीनों गाँव वाले हक्के-बक्के रह गए। उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ।
एक आदमी ने झल्लाते हुए पूछा, "अरे मूर्ख! जब तेरा सिक्का उस अँधेरी गली में गिरा था, तो तू उसे यहाँ इस चौराहे की रोशनी में क्यों ढूँढ रहा है?"
शेख चिल्ली ने बहुत ही गर्व से मुस्कुराते हुए ऐसा जवाब दिया जिसने गाँव वालों का सिर घुमा दिया। शेख बोला: "अरे भाई! तुम लोग भी अजीब बात करते हो। उस गली में तो इतना भयानक अँधेरा है कि वहाँ कुछ दिखाई ही नहीं देता! वहाँ सिक्का कैसे मिलता? इसलिए मैं उसे यहाँ ढूँढ रहा हूँ, क्योंकि 'यहाँ पर बहुत अच्छा उजाला है!' अब तुम ही बताओ, कोई चीज़ उजाले में जल्दी मिलेगी या अँधेरे में?"
शेख चिल्ली का यह अद्भुत तर्क सुनकर गाँव वालों ने अपना माथा पीट लिया। उन्हें समझ आ गया कि वे दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़ के साथ मिलकर अपना समय बर्बाद कर रहे थे। वे उसे वहीं छोड़कर भुनभुनाते हुए अपने-अपने घर चले गए, और शेख चिल्ली उस लालटेन की रोशनी में अपना सिक्का ढूँढता ही रह गया।
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