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शेख चिल्ली और अंडों की टोकरी (सपनों का महल)

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
शेख चिल्ली और अंडों की टोकरी (सपनों का महल)

एक समय की बात है, किसी गाँव में शेख चिल्ली नाम का एक नौजवान रहता था। वह स्वभाव से बहुत ही भोला-भाला था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह हर समय 'खयाली पुलाव' पकाता रहता था। उसे मेहनत करने से ज्यादा, खुली आँखों से सपने देखने में मज़ा आता था।

एक दिन सुबह-सुबह शेख चिल्ली काम की तलाश में बाज़ार के चौराहे पर खड़ा था। तभी वहाँ गाँव का एक अमीर सेठ आया। सेठ के पास एक बहुत बड़ी टोकरी थी, जो ताज़े अंडों से पूरी तरह भरी हुई थी। सेठ को अपने घर तक वह टोकरी ले जाने के लिए एक मज़दूर की तलाश थी।

सेठ ने शेख चिल्ली को देखा और कहा, "अरे शेख! क्या तुम यह अंडों की टोकरी मेरे घर तक पहुँचा दोगे? इसके बदले में मैं तुम्हें मज़दूरी के तौर पर इस टोकरी में से दो अंडे दूँगा।"

दो अंडों की मज़दूरी सुनकर शेख चिल्ली तुरंत तैयार हो गया। उसने वह भारी टोकरी बड़ी सावधानी से अपने सिर पर रख ली और सेठ के पीछे-पीछे उसके घर की तरफ चलने लगा।

रास्ते में चलते-चलते शेख चिल्ली की आदत के अनुसार उसका दिमाग फिर से खयाली पुलाव पकाने लगा। वह सिर पर अंडों की टोकरी रखे हुए मन ही मन सोचने लगा:

"सेठ मुझे मज़दूरी में दो अंडे देगा। मैं उन अंडों को खाऊँगा नहीं, बल्कि अपनी मुर्गी के नीचे सेने के लिए रख दूँगा। कुछ ही दिनों में उन अंडों में से दो चूज़े निकलेंगे। मैं उन्हें खूब दाना खिलाऊँगा और वे बड़ी होकर मुर्गियाँ बन जाएँगी। फिर वे दोनों मुर्गियाँ बहुत सारे अंडे देंगी, जिनसे और मुर्गियाँ निकलेंगी। देखते ही देखते मेरे पास मुर्गियों का एक बहुत बड़ा पोल्ट्री फार्म हो जाएगा!"

शेख चिल्ली के कदम सपनों की दुनिया में और गहरे उतरते जा रहे थे। उसने आगे सोचा: "जब मेरे पास बहुत सारी मुर्गियाँ हो जाएँगी, तो मैं उन सबको बाज़ार में बेचकर बहुत सारे पैसे कमाऊँगा। उन पैसों से मैं कुछ बकरियाँ खरीदूँगा। बकरियों का कुनबा बढ़ेगा, तो मैं उन्हें बेचकर गाय और भैंसें खरीद लूँगा। मैं गाँव का सबसे बड़ा दूध का व्यापारी बन जाऊँगा और इतना पैसा कमाऊँगा कि मेरा एक बहुत ही शानदार महल होगा!"

सपनों का महल खड़ा हो चुका था। शेख चिल्ली के होंठों पर एक चौड़ी मुस्कान थी। वह सोचता गया: "जब मैं इतना अमीर सेठ बन जाऊँगा, तो गाँव के सबसे बड़े ज़मींदार की खूबसूरत बेटी से मेरी शादी होगी। हमारे घर में खुशियाँ आएँगी और हमारे बहुत ही प्यारे-प्यारे बच्चे होंगे। मेरे बच्चे बहुत नटखट होंगे। मैं जब दिन भर का थका-हारा अपने महल में आराम करने के लिए लेटूँगा, तो वे बच्चे मेरे पास आकर मुझे परेशान करेंगे और कहेंगे— अब्बा जान! हमारे साथ खेलिए! अब्बा जान! हमें बाज़ार ले चलिए!"

शेख चिल्ली सपनों में इतना खो चुका था कि उसे असल दुनिया का कोई होश नहीं रहा। उसने सोचा: "मैं थका हुआ होऊँगा और बच्चे मुझे आराम नहीं करने देंगे। मुझे बहुत गुस्सा आएगा। मैं उन बच्चों को डांटते हुए अपना सिर ज़ोर से ऐसे झटकूँगा और कहूँगा— हटो यहाँ से! मुझे सोने दो!"

और यही सोचते-सोचते, शेख चिल्ली ने हकीकत में भी बड़े ही गुस्से से अपना सिर ज़ोर से झटक दिया!

सिर झटकते ही, सिर पर रखी वह बड़ी सी अंडों की टोकरी संतुलन खो बैठी और सीधे ज़मीन पर आकर गिरी। टोकरी ज़मीन पर गिरते ही सारे अंडे टूटकर चकनाचूर हो गए और चारों तरफ ज़र्दी फैल गई।

अंडों के टूटने की आवाज़ से शेख चिल्ली की नींद खुली। उसका सपनों का महल, उसकी मुर्गियाँ, बकरियाँ, गाय और बीवी-बच्चे सब एक पल में चकनाचूर हो गए।

सेठ ने जब अपने सारे अंडे टूटे हुए देखे, तो वह गुस्से से आग-बबूला हो गया। उसने शेख का कॉलर पकड़कर चिल्लाते हुए कहा, "अरे बेवकूफ़! तूने मेरे सारे अंडे फोड़ दिए! मेरा इतना बड़ा नुकसान कर दिया, अब मैं तुझे नहीं छोडूँगा!"

शेख चिल्ली अपनी ही दुनिया में बर्बाद होकर रोने लगा और रोते हुए सेठ से बोला, "अरे सेठ जी! आप तो अपने सिर्फ सौ-पचास अंडों के लिए रो रहे हैं, ज़रा मेरा दुख तो देखिए! इस टोकरी के गिरने से मेरी तो पूरी गृहस्थी उजड़ गई! मेरे बीवी-बच्चे, मेरी मुर्गियाँ और मेरी गाय-भैंसें सब मर गईं!"

शेख चिल्ली की यह अजीब और बेतुकी बात सुनकर सेठ अपना माथा पीट कर रह गया।

🎉 कहानी समाप्त

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