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गधों की गिनती का चक्कर

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
गधों की गिनती का चक्कर

एक बार गाँव के एक बड़े व्यापारी को दूसरे गाँव से माल ढोने के लिए कुछ गधों की ज़रूरत पड़ी। व्यापारी जानता था कि शेख चिल्ली मेहनती है, बस दिमाग से थोड़ा पैदल है। उसने शेख चिल्ली को बुलाया और उसे कुछ पैसे देकर कहा, "शेख! तुम पास के पशु बाज़ार में जाओ और मेरे लिए पूरे 'दस गधे' खरीद कर लाओ। ध्यान रखना, गिनती में कोई गलती नहीं होनी चाहिए।"

शेख चिल्ली ने पैसे लिए और खुशी-खुशी बाज़ार पहुँच गया। उसने चुन-चुनकर अच्छे और तगड़े दस गधे खरीद लिए। गधों की रस्सी अपने हाथ में पकड़कर वह गाँव की तरफ वापस लौटने लगा।

दोपहर का समय था और धूप बहुत तेज़ थी। कुछ दूर पैदल चलने के बाद शेख चिल्ली थक गया। उसने सोचा, "मेरे पास इतने सारे गधे हैं, तो मैं पैदल क्यों चलूँ? क्यों न मैं इनमें से एक गधे पर बैठ जाऊँ और बाकी गधों को आगे-आगे हाँकता हुआ ले चलूँ।"

यही सोचकर शेख चिल्ली ने अपनी सुविधा के लिए एक गधे को चुना और उसके ऊपर आराम से बैठ गया। बाकी नौ गधे उसके आगे-आगे कतार में चलने लगे।

कुछ दूर चलने के बाद शेख चिल्ली के मन में अचानक एक शंका उठी। उसे लगा कि कहीं कोई गधा पीछे छूट तो नहीं गया। उसने व्यापारी से वादा किया था कि वह पूरे दस गधे लेकर आएगा। अपनी तसल्ली के लिए उसने गधों की गिनती शुरू की।

वह गधे पर बैठा-बैठा ही अपनी उँगली से आगे चल रहे गधों को गिनने लगा— "एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, और नौ..."

"नौ? अरे बाप रे! यह क्या हो गया?" शेख चिल्ली घबरा गया। उसने फिर से गिनती की— "एक, दो, तीन... आठ, नौ!"

गिनती में फिर से 'नौ' ही गधे निकले। असल में शेख चिल्ली बेवकूफी में उस दसवें गधे को गिनना ही भूल गया था, जिसके ऊपर वह खुद बैठा हुआ था!

शेख चिल्ली के पसीने छूट गए। उसे लगा कि बाज़ार से निकलते ही उसका एक गधा चोरी हो गया है या रास्ता भटक गया है। वह घबराहट में तुरंत गधे की पीठ से नीचे कूद पड़ा।

नीचे ज़मीन पर खड़े होकर उसने सोचा कि वह सारे गधों को एक जगह इकट्ठा करके फिर से गिनेगा। उसने सारे गधों को एक लाइन में खड़ा किया और इस बार ज़मीन पर खड़े होकर तसल्ली से गिनना शुरू किया—

"एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ... और यह रहा दस!"

दस गधे पूरे देखकर शेख चिल्ली ने एक बहुत ही लंबी राहत की साँस ली। उसने अपना माथा पोंछा और मुस्कुराते हुए खुद से कहा, "शुक्र है अल्लाह का! गधा कहीं नहीं गया। मुझे ही गिनने में कोई गलती हो गई थी। सारे दस के दस गधे यहीं हैं।"

तसल्ली होने के बाद शेख चिल्ली फिर से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। वह दोबारा उसी गधे की पीठ पर बैठ गया और बाकी गधों को आगे हाँकने लगा।

थोड़ी दूर और चलने के बाद, उसका वहम फिर से जाग उठा। उसने सोचा कि एक बार फिर से गिनती कर लेनी चाहिए, कहीं सच में कोई गधा गायब न हो जाए।

शेख गधे पर बैठे-बैठे ही फिर से उँगली उठाने लगा— "एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, और नौ..."

"हाय अल्लाह! फिर से नौ?" शेख चिल्ली अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। उसे लगने लगा कि ज़रूर इस रास्ते में कोई भूत-प्रेत या बहुत बड़ा जादूगर है।

जब वह गधे से नीचे उतरता है, तो गधे दस हो जाते हैं। और जब वह गधे पर बैठता है, तो एक गधा गायब होकर नौ रह जाते हैं!

वह इसी उलझन में ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ा रहा था कि तभी रास्ते से गुज़रते हुए एक मुसाफिर ने शेख चिल्ली को परेशान देखा। मुसाफिर ने रुक कर पूछा, "क्या बात है भाई? इतने परेशान क्यों लग रहे हो? क्या कुछ खो गया है?"

शेख चिल्ली ने लगभग रोते हुए कहा, "अरे भाई साहब! यहाँ कोई बहुत बड़ा जादू है। मैंने दस गधे खरीदे थे। लेकिन जब मैं गधे पर बैठकर गिनता हूँ, तो गधे नौ निकलते हैं। और जब मैं ज़मीन पर उतर कर गिनता हूँ, तो गधे पूरे दस हो जाते हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि यह दसवाँ गधा मेरे बैठते ही कहाँ गायब हो जाता है!"

मुसाफिर यह सुनकर एक पल के लिए हैरान हुआ, लेकिन जब उसने गधे पर बैठे शेख चिल्ली को देखा, तो उसे सारी बात समझ में आ गई। मुसाफिर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगा।

हँसते-हँसते मुसाफिर ने कहा, "अरे भोले इंसान! इसमें कोई जादू या भूत-प्रेत नहीं है। जादू तेरे दिमाग में है। ज़रा यह तो देख कि तू जिस गधे पर बैठा है, वह कौन सा है? तू आगे चल रहे नौ गधों को तो गिन रहा है, लेकिन उस दसवें गधे को गिनना भूल जाता है जिस पर तू खुद सवारी कर रहा!"

शेख चिल्ली ने जब मुसाफिर की बात सुनी, तो उसे अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ। उसने नीचे देखा कि वह सच में एक गधे पर बैठा है। वह शर्म से लाल हो गया और मुसाफिर को धन्यवाद देते हुए बिना कोई गिनती किए चुपचाप गाँव की तरफ चल दिया।

🎉 कहानी समाप्त

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