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😄 शेखचिल्ली

कौवा कान ले गया!

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
कौवा कान ले गया!

शेख चिल्ली अपनी बेवकूफी और भोलेपन के कारण पूरे गाँव के लिए हमेशा मनोरंजन का एक बड़ा साधन रहता था। वह किसी की भी बात पर बिना सोचे-समझे तुरंत यकीन कर लेता था, चाहे वह बात कितनी भी बेतुकी क्यों न हो।

गर्मियों की एक खुशनुमा सुबह थी। शेख चिल्ली अपने घर से निकलकर बाज़ार की तरफ जा रहा था। वह अपनी ही धुन में मगन होकर, हवा में हाथ हिलाते हुए चल रहा था।

उसी रास्ते पर गाँव के कुछ शरारती नौजवान पेड़ की छाँव में बैठे गपशप कर रहे थे। जब उन्होंने शेख चिल्ली को अपनी तरफ आते देखा, तो उनके मन में शरारत सूझी। उनमें से एक सबसे चालू लड़के ने शेख को बेवकूफ़ बनाने की एक बहुत ही मज़ेदार योजना सोची।

जैसे ही शेख चिल्ली उनके पास से गुज़रा, वह लड़का अचानक अपनी जगह से उछलकर खड़ा हो गया। उसने बहुत ही घबराई हुई और तेज़ आवाज़ में शेख की तरफ इशारा करते हुए चिल्लाया, "अरे शेख! गज़ब हो गया! जल्दी देखो, वह आसमान में उड़ता हुआ कौवा तुम्हारा एक कान अपने चोंच में दबाकर ले जा रहा है!"

शेख चिल्ली ने जैसे ही यह बात सुनी, उसके तो होश ही उड़ गए। उसने यह सोचने की ज़हमत तक नहीं उठाई कि भला कोई कौवा उड़ते-उड़ते किसी इंसान का कान कैसे काट सकता है? और सबसे बड़ी बात, उसने अपना हाथ उठाकर अपने ही कान को छूकर देखने की कोशिश भी नहीं की!

उसने तुरंत अपनी नज़रें आसमान की तरफ घुमाईं। इत्तेफाक से ठीक उसी समय आसमान में एक कौवा उड़ता हुआ जा रहा था। शेख चिल्ली को लगा कि यह वही कौवा है जो उसका कान चुराकर भाग रहा है।

"अरे चोर! मेरा कान वापस कर! मुझे अंधा तो नहीं, कम से कम बहरा तो मत बना!" शेख चिल्ली ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए उस उड़ते हुए कौवे के पीछे अंधाधुंध दौड़ पड़ा।

कौवा आसमान में उड़ रहा था और शेख चिल्ली ज़मीन पर धूल उड़ाता हुआ उसके पीछे-पीछे भाग रहा था। वह गाँव की गलियों से गुज़रा, बाज़ार से गुज़रा और लोगों से टकराता हुआ भागता रहा। उसकी नज़रें सिर्फ उस कौवे पर टिकी थीं।

गाँव के लोग यह अजीबोगरीब नज़ारा देखकर हैरान थे। जो लोग उसे भागते हुए देखते, वे पूछते, "अरे शेख! क्या हो गया? पागल हो गया है क्या? ऐसे आसमान की तरफ देखकर किसके पीछे भाग रहा है?"

शेख चिल्ली हाँफते हुए और बिना रुके जवाब देता, "अरे भाई! मुझे रोको मत। वह देखो ऊपर जो दुष्ट कौवा उड़ रहा है, वह मेरा बायाँ कान काटकर ले गया है। मैं अपना कान वापस लेने जा रहा हूँ!"

यह सुनकर गाँव का एक बहुत ही समझदार और बुजुर्ग आदमी बीच रास्ते में खड़ा हो गया और उसने शेख चिल्ली को ज़बरदस्ती पकड़ लिया।

बुजुर्ग ने डांटते हुए कहा, "रुक जा मूर्ख! ये क्या पागलों जैसी हरकत कर रहा है? एक कौवा इंसान का कान कैसे ले जा सकता है?"

शेख चिल्ली ने रोने जैसी सूरत बनाकर कहा, "अरे काका! आप मुझे छोड़ दीजिए, वह मेरा कान लेकर दूर चला जाएगा। उन लड़कों ने अपनी आँखों से देखा है!"

बुजुर्ग ने अपना माथा पीट लिया और कहा, "अरे शेख! तूने उन लड़कों की बात मान ली, लेकिन क्या तूने एक बार भी अपना हाथ अपने कान पर लगाकर देखा है? पहले ज़रा अपना हाथ अपने कान तक ले जा और देख कि कान वहाँ है या नहीं!"

शेख चिल्ली ठिठक गया। उसने धीरे से अपना काँपता हुआ हाथ अपने बाएँ कान की तरफ बढ़ाया। जैसे ही उसके हाथ ने उसके कान को छुआ, वह हैरान रह गया। उसका कान तो बिल्कुल अपनी जगह पर सुरक्षित था, उसमें कोई खरोंच तक नहीं थी!

शेख चिल्ली ने झेंपते हुए बुजुर्ग की तरफ देखा और कहा, "अरे काका! आप तो सच कह रहे हैं। मेरा कान तो मेरे ही पास है। उन दुष्ट लड़कों ने तो मुझे बेवजह ही पूरे गाँव में दौड़ा दिया।"

बुजुर्ग ने हँसते हुए शेख को एक बहुत ही गहरी बात समझाई, "शेख! जब कोई कहे कि कौवा कान ले गया, तो कौवे के पीछे भागने से पहले इंसान को अपना कान टटोल लेना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर बिना सोचे यकीन करने वाले की हालत हमेशा तेरे जैसी ही होती है।"

शेख चिल्ली शर्म के मारे अपना सिर झुकाकर चुपचाप अपने घर की तरफ लौट गया, और पूरा बाज़ार उसकी इस बेवकूफी पर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

🎉 कहानी समाप्त

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