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शेख चिल्ली और तेल का मटका

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
शेख चिल्ली और तेल का मटका

शेख चिल्ली के खयाली पुलाव पकाने की आदत इतनी पुरानी थी कि गाँव का बच्चा-बच्चा उससे वाकिफ था। लेकिन शेख की इस आदत की वजह से अक्सर दूसरों का भारी नुकसान हो जाया करता था।

सर्दियों के दिन थे। गाँव के एक तेल के व्यापारी को पास के कस्बे में 'सरसों का शुद्ध तेल' भिजवाना था। उसने एक बहुत बड़े मिट्टी के मटके में ऊपर तक तेल भरवा लिया। मटका इतना भारी था कि उसे उठाने के लिए किसी हट्टे-कट्टे मज़दूर की ज़रूरत थी।

व्यापारी ने जब शेख चिल्ली को चौराहे पर खाली बैठे देखा, तो उसे अपने पास बुलाया। व्यापारी ने कहा, "शेख! यह सरसों के तेल का मटका बहुत महँगा है। तुम्हें इसे बहुत सावधानी से मेरे ग्राहक के घर तक पहुँचाना है। अगर तुम इसे सही-सलामत ले गए, तो मैं तुम्हें मज़दूरी के तौर पर पूरे दो रुपये दूँगा।"

उन दिनों दो रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। दो रुपये का नाम सुनते ही शेख चिल्ली की आँखें चमक उठीं। उसने तुरंत हामी भर दी। व्यापारी ने कुछ लोगों की मदद से वह भारी मटका उठवाकर शेख चिल्ली के सिर पर रखवा दिया।

शेख चिल्ली मटका सिर पर रखकर कस्बे की तरफ चल पड़ा। रास्ता लंबा था और मटका भारी, लेकिन शेख का दिमाग तो किसी और ही दुनिया में उड़ने लगा था। उसने सिर पर मटका सँभाले हुए हवा में महल बनाने शुरू कर दिए:

"वाह! आज तो मुझे पूरे दो रुपये मिलेंगे। मैं इन दो रुपयों को खर्च नहीं करूँगा, बल्कि इनसे एक मुर्गी खरीदूँगा। मुर्गी अंडे देगी, उन अंडों को बेचकर मैं एक मोटी ताज़ी बकरी खरीदूँगा। बकरी के दूध और उसके बच्चों को बेचकर मैं एक शानदार गाय खरीद लूँगा। गाय का दूध बेचकर मैं बहुत सारा पैसा जमा कर लूँगा और गाँव का सबसे बड़ा व्यापारी बन जाऊँगा!"

शेख चिल्ली के कदमों में एक गज़ब की फुरती आ गई थी। वह आगे सोचने लगा: "जब मेरे पास बहुत सारा पैसा हो जाएगा, तो मैं अपने लिए एक बहुत बड़ी हवेली बनवाऊँगा। मेरी हवेली में नौकर-चाकर काम करेंगे। फिर मेरी शादी एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से होगी। मैं मलमल के कपड़े पहनकर अपनी हवेली के एक बड़े से तख्त पर बैठा करूँगा और हुक्का पीते हुए अपने नौकरों पर रौब जमाया करूँगा।"

सपनों की उड़ान अपने चरम पर थी। शेख चिल्ली ने मन ही मन एक बहुत ही शरारती और कामचोर 'काल्पनिक नौकर' भी गढ़ लिया।

उसने सोचा: "मैं एक बहुत ही सख्त मालिक बनूँगा। अगर मेरा नौकर काम में थोड़ी सी भी ढील करेगा या मुझे पानी पिलाने में देर करेगा, तो मैं उसे बिल्कुल नहीं बख्शूँगा। मैं अपनी जगह से उठूँगा, अपने हाथ में एक मोटी सी लाठी पकड़ूँगा और उस कामचोर नौकर को डांटते हुए ऐसे ज़ोर से लाठी मारूँगा— 'कामचोर! मेरी हवेली में रहकर काम नहीं करता!'"

सपनों में खोए हुए शेख चिल्ली को यह बिल्कुल याद नहीं रहा कि वह असल में कोई लाठी नहीं चला रहा है, बल्कि उसके सिर पर तेल का एक बहुत भारी मटका रखा हुआ है।

अपने खयाली नौकर को पीटने के जोश में आकर, शेख चिल्ली ने हकीकत में अपना हाथ हवा में उठाया और एक बहुत ही ज़ोरदार काल्पनिक लाठी हवा में भाँज दी!

लाठी चलाने के लिए जैसे ही उसका शरीर हिला, सिर पर रखा वह विशाल और भारी तेल का मटका संतुलन खो बैठा। मटका सीधा शेख के सिर से फिसलकर ज़मीन पर आ गिरा— 'छन्न... धड़ाम!'

मटका ज़मीन पर गिरते ही चकनाचूर हो गया और कई लीटर महँगा सरसों का तेल ज़मीन की मिट्टी में बहने लगा।

मटके के टूटने की आवाज़ से शेख चिल्ली की नींद टूटी। उसने ज़मीन पर फैले हुए तेल और मटके के टुकड़ों को देखा। उसका शानदार महल, नौकर-चाकर, बीवी और गाय-बकरी सब उस सरसों के तेल के साथ ज़मीन में समा गए थे।

तभी पीछे से वह तेल का व्यापारी वहाँ आ पहुँचा। जब उसने देखा कि उसका महँगा तेल मिट्टी में मिल गया है, तो वह गुस्से से लाल-पीला हो गया।

व्यापारी ने अपना माथा पीटते हुए कहा, "अरे सत्यानाशी! तूने मेरा पूरा व्यापार मिट्टी में मिला दिया। मेरा इतना महँगा तेल ज़मीन पर बहा दिया। मैं तुझे नहीं छोडूँगा!"

शेख चिल्ली बीच सड़क पर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा और आँसू पोंछते हुए बोला, "अरे सेठ जी! आपको तो बस अपने थोड़े से तेल की पड़ी है। आप मेरा नुकसान क्यों नहीं देखते? इस मटके के फूटने से मेरी हवेली ढह गई, मेरे नौकर भाग गए और मेरी पूरी गृहस्थी उजड़ गई! आप तो अपने तेल का रो रहे हैं, मैं अपनी उजड़ी हुई दुनिया का क्या करूँ?"

शेख चिल्ली की यह बेतुकी बातें सुनकर राहगीर हँसने लगे और तेल का व्यापारी सिर पकड़ कर बैठ गया।

🎉 कहानी समाप्त

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