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शेख चिल्ली और कुएँ में चाँद

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
शेख चिल्ली और कुएँ में चाँद

शेख चिल्ली की दुनिया बिल्कुल अलग थी। वह चीज़ों को वैसे नहीं देखता था जैसे आम लोग देखते हैं। उसकी नज़र में हर साधारण सी बात के पीछे कोई बहुत बड़ा रहस्य छिपा होता था।

गर्मियों की एक बहुत ही खूबसूरत और सुहानी रात थी। आसमान एकदम साफ़ था और पूरा चाँद अपनी दूधिया रोशनी से पूरे गाँव को नहला रहा था। आधी रात का समय हो चुका था और शेख चिल्ली को ज़ोरों की प्यास लगी। उसके घर के घड़े में पानी खत्म हो गया था।

शेख चिल्ली ने एक बाल्टी और रस्सी उठाई और पानी भरने के लिए अपने घर के पिछवाड़े बने पुराने कुएँ की तरफ चल दिया।

कुएँ की मुंडेर पर पहुँचकर शेख चिल्ली ने जैसे ही बाल्टी नीचे डालने के लिए कुएँ के अंदर झाँका, वह बुरी तरह चौंक गया।

कुएँ का पानी बिल्कुल शांत था और उस शांत पानी में आसमान के 'चाँद' की बिल्कुल साफ़ और चमकदार परछाई नज़र आ रही थी। शेख चिल्ली ने ज़िंदगी में कभी पानी में चाँद की परछाई पर इस तरह गौर नहीं किया था। उसकी मासूम और बेवकूफ़ बुद्धि ने तुरंत एक खतरनाक नतीजा निकाल लिया।

"हाय अल्लाह! गज़ब हो गया!" शेख चिल्ली ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा। "बेचारा चाँद! आसमान से फिसल कर सीधे मेरे कुएँ में आ गिरा है। अगर यह सारी रात इसी ठंडे पानी में पड़ा रहा, तो इसे तो सर्दी लग जाएगी। और अगर सुबह तक यह बाहर नहीं निकला, तो कल रात दुनिया में रोशनी कौन करेगा?"

शेख चिल्ली का दिल बहुत नर्म था। उसने तुरंत फैसला किया कि चाहे जो हो जाए, वह इस चाँद को कुएँ में डूबने नहीं देगा और इसे वापस आसमान में पहुँचा कर ही दम लेगा।

वह दौड़कर घर के अंदर गया और एक बहुत लंबी और मज़बूत रस्सी के साथ लोहे का एक बड़ा सा 'काँटा' ले आया। उसने उस लोहे के काँटे को रस्सी के एक सिरे पर कसकर बाँधा।

शेख चिल्ली ने कुएँ में झाँकते हुए चाँद से कहा, "घबराओ मत चंदा मामा! मैं तुम्हें अभी बाहर निकालता हूँ।"

उसने वह लोहे का काँटा रस्सी के सहारे धीरे-धीरे कुएँ के पानी में नीचे उतारा। उसका इरादा उस काँटे को चाँद में फँसाकर उसे ऊपर खींचने का था। काँटा जैसे ही पानी में गया, पानी हिलने लगा और चाँद की परछाई भी छटपटाने लगी।

शेख को लगा कि चाँद बाहर आने के लिए तड़प रहा है। उसने काँटे को पानी के अंदर इधर-उधर घुमाया। तभी कुएँ की भीतरी दीवार के एक पुराने और मज़बूत पत्थर की दरार में वह लोहे का काँटा बुरी तरह से फँस गया।

शेख चिल्ली ने जब रस्सी ऊपर खींचने की कोशिश की, तो रस्सी बिल्कुल नहीं हिली।

शेख चिल्ली के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। उसने सोचा: "अरे वाह! काँटा बिल्कुल सही जगह लगा है। चाँद बहुत भारी है, इसलिए काँटा फँस गया है। अब मुझे अपनी पूरी ताक़त लगाकर इस चाँद को बाहर खींचना होगा!"

शेख ने अपने दोनों हाथों से रस्सी को कसकर पकड़ा, अपने पैर कुएँ की मुंडेर पर टिकाए और पीछे की तरफ पूरा ज़ोर लगाकर रस्सी खींचने लगा— "या अल्लाह! ज़ोर लगा के हईशा!"

शेख चिल्ली पसीने से नहा गया, लेकिन पत्थर में फँसा काँटा टस से मस नहीं हुआ। शेख ने हार नहीं मानी। उसने अपनी ज़िंदगी की पूरी ताक़त इकट्ठी की और एक झटके के साथ पूरी जान लगाकर रस्सी को पीछे की तरफ खींचा।

शेख का ज़ोर इतना भयानक था कि कुएँ के अंदर फँसी हुई वह पुरानी रस्सी उस झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाई और बीच में से 'कड़ाक्' की आवाज़ के साथ टूट गई!

रस्सी के टूटते ही शेख चिल्ली का संतुलन बिगड़ गया और वह हवा में उछलता हुआ, पीठ के बल बहुत ज़ोर से ज़मीन पर चारों खाने चित्त जा गिरा— 'धड़ाम!'

शेख की कमर में बहुत ज़ोर की चोट लगी। वह दर्द से कराहता हुआ सीधा ज़मीन पर लेटा हुआ था।

जैसे ही उसने दर्द से अपनी आँखें खोलीं, उसकी नज़र सीधे ऊपर आसमान पर गई। और आसमान में क्या था? वही चमकता हुआ गोल 'चाँद', जो अपनी पूरी शान के साथ जगमगा रहा था!

शेख चिल्ली दर्द भूलकर खुशी से मुस्कुरा उठा। उसने आसमान में चमकते हुए चाँद को देखकर एक बहुत ही गहरी और संतुष्टि भरी साँस ली और अपने आप से कहा:

"वाह शेख! मान गया तेरी ताक़त को। बेशक तेरी कमर टूट गई, तुझे चोट भी बहुत लगी, लेकिन तेरी मेहनत रंग लाई। आखिरकार तूने इतनी ताक़त लगाकर बेचारे चाँद को कुएँ से बाहर निकालकर वापस आसमान में पहुँचा ही दिया! अगर आज मैं न होता, तो यह चाँद तो कुएँ में ही डूब कर मर जाता।"

अपनी इस महान 'सफलता' पर गर्व करता हुआ, शेख चिल्ली बिना पानी पिए ही खुशी-खुशी जाकर सो गया।

🎉 कहानी समाप्त

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