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😄 शेखचिल्ली

जिस डाल पर बैठा, उसी को काटना

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
जिस डाल पर बैठा, उसी को काटना

शेख चिल्ली की बेवकूफी के किस्से पूरे गाँव में मशहूर थे। गाँव का हर इंसान जानता था कि शेख का दिमाग हमेशा उल्टा ही काम करता है।

सर्दियों का मौसम आने वाला था। एक दिन शेख चिल्ली की माँ ने उसे बुलाया और कहा, "बेटा शेख! घर में चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियाँ खत्म हो गई हैं। तू जंगल जा और पेड़ से कुछ सूखी लकड़ियाँ काट कर ले आ।"

शेख चिल्ली अपनी कुल्हाड़ी कंधे पर रखकर खुशी-खुशी जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल में पहुँचकर वह एक बहुत बड़े और पुराने पेड़ के पास रुका। उस पेड़ पर बहुत सारी हरी-भरी डालियाँ थीं, लेकिन बिल्कुल ऊपर एक बहुत ही मोटी सी डाली थी, जो पूरी तरह से सूख चुकी थी।

शेख चिल्ली झटपट पेड़ पर चढ़ गया और उस सूखी डाली के पास पहुँच गया। अब लकड़ी काटने का सही तरीका यह होता है कि इंसान डाली के उस हिस्से पर बैठे जो पेड़ के तने से जुड़ा हो, और आगे की लकड़ी काटे।

लेकिन चूँकि यह शेख चिल्ली था, इसलिए उसने अपनी बुद्धि का अद्भुत इस्तेमाल किया। वह उस सूखी डाली के बिल्कुल 'आखिरी सिरे' पर जाकर बैठ गया और अपने मुँह की तरफ से उस हिस्से को कुल्हाड़ी से काटने लगा जो पेड़ के मुख्य तने से जुड़ा था!

वह ज़ोर-ज़ोर से कुल्हाड़ी मार रहा था। उसी समय पेड़ के नीचे से एक राहगीर (मुसाफिर) गुज़र रहा था। राहगीर ने जब ऊपर देखा, तो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ।

राहगीर ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "अरे भाई! यह तू क्या बेवकूफी कर रहा है? तू जिस डाल पर बैठा है, उसी को जड़ से काट रहा है! जब डाल कटेगी, तो तू भी उसके साथ नीचे ज़मीन पर गिरकर मर जाएगा। थोड़ा आगे खिसक जा!"

शेख चिल्ली ने कुल्हाड़ी चलाना रोका और नीचे झाँककर राहगीर को बहुत ही घमंड से देखा। शेख को लगा कि यह मुसाफिर व्यर्थ में उसे ज्ञान बाँट रहा है। शेख ने चिढ़कर कहा, "अरे जा अपना काम कर! मैं कोई बेवकूफ़ हूँ जो गिर जाऊँगा? मैं बहुत मज़बूती से बैठा हूँ। तू मुझे अपना काम मत सिखा!"

राहगीर ने अपना सिर हिलाया। वह समझ गया कि इस बेवकूफ़ को समझाना भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर है। वह वहाँ से अपने रास्ते चला गया।

शेख चिल्ली ने फिर से पूरे ज़ोर के साथ अपनी कुल्हाड़ी चलानी शुरू कर दी। डाली पहले ही सूखी थी। कुछ ही देर में कुल्हाड़ी की तेज़ चोटों से वह सूखी डाली जड़ से टूट गई।

और जैसा कि राहगीर ने कहा था— डाली के टूटते ही शेख चिल्ली हवा में उछला और उसी डाली के साथ सीधे ज़मीन पर आकर औंधे मुँह गिरा!

शेख चिल्ली की कमर में बहुत ज़ोर की चोट लगी और उसकी चीख निकल गई। दर्द से कराहते हुए जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसे तुरंत उस राहगीर की बात याद आ गई।

शेख चिल्ली ने सोचा, "अरे बाप रे! उस आदमी ने तो पहले ही बता दिया था कि मैं गिरने वाला हूँ। इसका मतलब वह कोई आम इंसान नहीं था, वह ज़रूर कोई पहुँचा हुआ भविष्यवक्ता या देवता था, जिसे भविष्य दिखाई देता है!"

दर्द भूलकर शेख चिल्ली तुरंत अपनी जगह से उठा और लंगड़ाता हुआ उसी रास्ते पर दौड़ पड़ा जिस रास्ते पर वह राहगीर गया था।

काफी दूर भागने के बाद उसे वह राहगीर दिखाई दिया। शेख चिल्ली दौड़कर गया और सीधे उस राहगीर के पैरों में गिर पड़ा।

राहगीर घबरा गया और बोला, "अरे भाई! यह क्या कर रहे हो?"

शेख चिल्ली रोते हुए बोला, "हे ज्ञानी बाबा! मुझे माफ़ कर दीजिए। आपने बिल्कुल सच कहा था, मैं उस डाल से नीचे गिर गया। आपको तो भविष्य दिखाई देता है! अब चूँकि आपको सब पता है, तो बस मुझे इतना बता दीजिए कि 'मेरी मौत कब होगी?' मैं मरने से पहले अपने सारे काम पूरे करना चाहता हूँ।"

राहगीर समझ गया कि यह आदमी सिरे का पागल है। उसने शेख चिल्ली से पीछा छुड़ाने के लिए एक तरकीब सोची और बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा, "ठीक है बालक! सुन, जिस दिन तेरी पीठ और तेरा पेट, दोनों एक साथ मिल जाएँगे, समझ लेना उसी दिन तेरी मौत हो जाएगी!"

शेख चिल्ली ने इस बात को एक बहुत बड़ा ज्ञान मान लिया और राहगीर को धन्यवाद देकर खुशी-खुशी अपने घर की तरफ लौट गया।

🎉 कहानी समाप्त

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