बढ़ई का आख़िरी घर

बरसों तक एक बढ़ई ने एक ठेकेदार के लिए काम किया था। उसका काम बहुत बढ़िया था — मज़बूत नींव, सीधी दीवारें, चिकनी लकड़ी की फिनिशिंग। जिस भी घर को वह बनाता, लोग बरसों बाद भी उसकी तारीफ़ करते। पर अब वह बूढ़ा हो चला था, हाथों में पहले जैसी ताक़त नहीं रही थी, और उसने ठेकेदार से कहा — "अब मैं रिटायर होना चाहता हूँ। घर लौटकर अपनी पत्नी और परिवार के साथ बाक़ी की ज़िंदगी चैन से बिताना चाहता हूँ।"
ठेकेदार को यह सुनकर बहुत दुख हुआ, क्योंकि बढ़ई जैसा कारीगर मिलना मुश्किल था। उसने बढ़ई से गुज़ारिश की — "क्या तुम मेरे लिए एक आख़िरी घर बना सकते हो? सिर्फ़ एक आख़िरी बार, फिर मैं तुम्हें ख़ुशी-ख़ुशी विदा कर दूँगा।"
बढ़ई ने हामी तो भर दी, पर उसका मन अब उस काम में नहीं लगा हुआ था। उसका दिल और दिमाग़ पहले ही रिटायरमेंट की छुट्टी में पहुँच चुका था। वह सोचता रहता — "अब तो बस यह आख़िरी घर है, फिर हमेशा के लिए आराम।" इसी सोच में उसने काम में पहले जैसी लगन नहीं दिखाई। नींव जल्दबाज़ी में डाली, लकड़ी घटिया क़िस्म की इस्तेमाल की, दीवारें ठीक से सीधी नहीं कीं, कई जगह जोड़ कमज़ोर छोड़ दिए। उसका दिल कह रहा था — "जल्दी ख़त्म करो, आराम करने का वक़्त आ गया है।"
कुछ ही हफ़्तों में घर बनकर तैयार हो गया — देखने में ठीक-ठाक, पर अंदर से कमज़ोर, बिना उस मेहनत और लगन के जो बढ़ई की पहचान हुआ करती थी।
जब ठेकेदार घर देखने आया, तो उसने ध्यान से हर कोना देखा, हर दीवार को छुआ, फिर बढ़ई की तरफ़ मुड़कर चाबी उसके हाथ में थमा दी।
बढ़ई हैरान होकर बोला — "यह चाबी मुझे क्यों दे रहे हैं?"
ठेकेदार मुस्कुराते हुए बोला — "यह घर तुम्हारा है। बरसों की तुम्हारी वफ़ादार सेवा के लिए यह मेरी तरफ़ से तोहफ़ा है। मैं चाहता था कि तुम अपने बुढ़ापे में एक अच्छे घर में रहो, इसीलिए मैंने तुमसे यह आख़िरी घर बनवाया — यह जानते हुए कि यही घर अब तुम्हारा अपना घर होगा।"
बढ़ई के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे एक-एक पल याद आने लगा जब उसने जल्दबाज़ी में कमज़ोर जोड़ छोड़े थे, घटिया लकड़ी लगाई थी, दीवारें टेढ़ी छोड़ी थीं — यह सोचकर कि यह तो बस "आख़िरी काम" है, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर अब वही घर, अपनी सारी खामियों के साथ, उसका अपना घर बनने वाला था — जिसमें उसे अपनी बाक़ी की ज़िंदगी बितानी थी।
अगर उसे पहले से पता होता कि यह घर ख़ुद उसके लिए बन रहा है, तो वह हर कील, हर तख़्ता, हर दीवार को कितनी अलग तरह से, कितनी मेहनत और मोहब्बत से बनाता।
बढ़ई ने गहरी साँस ली और चाबी हाथ में लेकर बोला — "काश मैंने यह जानते हुए काम किया होता।"
उस दिन के बाद बढ़ई अक्सर अपने बेटे और शागिर्दों को यही सीख देता — "हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा जीवन अलग-अलग हिस्सों में बँटा है — काम का समय, आराम का समय, आख़िरी काम, नया काम। पर सच यह है कि हम हर दिन, हर काम से अपना ही जीवन बना रहे होते हैं। जिस दिन तुम यह भूलकर काम करते हो कि 'यह मायने नहीं रखता, यह तो बस आख़िरी है' — याद रखना, तुम ही उस घर में रहने वाले हो जो तुम आज बना रहे हो। इसलिए हर दीवार को इस तरह खड़ा करो, मानो तुम्हें ही उसमें हमेशा के लिए रहना हो।"
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