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लकड़ियों का बंडल

शिक्षाप्रद कहानियाँ4 मिनट का पठन
लकड़ियों का बंडल

बहुत पुरानी बात है, एक बूढ़े किसान के चार बेटे थे। बेटे उम्र में बड़े हो चुके थे, पर आपस में उनकी बिल्कुल नहीं बनती थी। हर छोटी-सी बात पर झगड़ते, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते, और अलग-अलग रहने की ज़िद करते रहते।

बूढ़े किसान को इस बात की बहुत चिंता रहती थी। उसने कई बार बेटों को समझाने की कोशिश की — "आपस में मिलजुल कर रहो, एक-दूसरे का साथ दो," पर बेटे उसकी बातों को हँसी में उड़ा देते।

एक दिन किसान ने सोचा कि नसीहत से नहीं, तो किसी और तरीक़े से समझाना होगा। उसने अपने चारों बेटों को बुलाया और खेत से लकड़ी की कुछ पतली-पतली छड़ियाँ मँगवाईं। उसने छड़ियों को एक मज़बूत रस्सी से आपस में बाँधकर एक बंडल बना दिया, और बड़े बेटे को वह बंडल थमाते हुए कहा — "इस पूरे बंडल को तोड़कर दिखाओ।"

बड़े बेटे ने पूरी ताक़त लगाई, बंडल को घुटने पर रखकर दबाया, हाथों से मरोड़ा, पर बंडल टूटा नहीं। उसने बंडल दूसरे भाई को थमा दिया। दूसरे भाई ने भी कोशिश की, फिर तीसरे ने, फिर चौथे ने — पर बंधी हुई लकड़ियों का वह बंडल किसी से भी नहीं टूटा।

चारों बेटे हैरान होकर बोले — "पिताजी, यह तो नामुमकिन है, इतनी मज़बूती से बँधा बंडल कोई नहीं तोड़ सकता।"

किसान मुस्कुराया। उसने रस्सी खोल दी और बंडल की सारी छड़ियाँ अलग-अलग कर दीं। फिर उसने एक-एक छड़ी बारी-बारी से हर बेटे को थमाई और कहा — "अब इसे तोड़कर दिखाओ।"

हर बेटे ने अपनी-अपनी अकेली छड़ी हाथ में ली, और हल्का-सा दबाव देते ही वह छड़ी "कट्" की आवाज़ के साथ आसानी से टूट गई।

किसान ने चारों बेटों की तरफ़ देखा और शांत आवाज़ में समझाया — "यही तुम्हारी असली कहानी है, बेटों। जब तक तुम एक-दूसरे से जुड़े रहोगे, एक-दूसरे का साथ दोगे, तब तक तुम्हें कोई भी मुश्किल, कोई भी दुश्मन तोड़ नहीं पाएगा — बिल्कुल इस बंधे हुए बंडल की तरह। पर जिस दिन तुम आपस में बँटकर, अलग-अलग खड़े हो जाओगे, उस दिन तुम्हें तोड़ना किसी के लिए भी उतना ही आसान होगा, जितना इन अकेली छड़ियों को तोड़ना था।"

चारों बेटे यह सुनकर एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि उनकी आपसी फूट ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी। उस दिन के बाद से चारों भाइयों ने आपस में मिलजुल कर रहना शुरू किया, एक-दूसरे के काम में हाथ बँटाया, और मुश्किल वक़्त में एक-दूसरे का साथ देने लगे।

गाँव में यह कहानी बरसों तक सुनाई जाती रही, और जब भी कोई परिवार आपस में बँटने की बात करता, बुज़ुर्ग यही याद दिलाते — "बंडल में बँधी लकड़ियों को कोई नहीं तोड़ पाता, पर अकेली छड़ी हर हवा के झोंके में टूट जाती है।"

🎉 कहानी समाप्त

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