भालू और भेड़िया — चोरी की दावत और लालच का फंदा

एक जंगल में एक भेड़िया और एक भालू रहते थे। भेड़िया बहुत ही चालाक और फुर्तीला था, जबकि भालू शरीर से भारी और खाने का बहुत बड़ा शौकीन था।
एक दिन भेड़िए ने गाँव में एक किसान के घर का 'गोदाम' खोज निकाला। उस गोदाम में ताज़ा मांस, पनीर और शहद के कई डिब्बे रखे थे। गोदाम में जाने का रास्ता केवल एक 'छोटा सा छेद' था, जो दीवार के नीचे बना था।
भेड़िए ने भालू को दावत का लालच दिया और दोनों रात के अंधेरे में उस छेद से रेंगकर गोदाम के अंदर घुस गए।
दावत और सतर्कता: अंदर पहुँचकर दोनों की आँखें फटी रह गईं। इतना सारा स्वादिष्ट खाना! दोनों ने पेट भर खाना शुरू कर दिया।
परंतु भेड़िया बहुत चतुर था। वह थोड़ा सा मांस खाता, और फिर जाकर उस 'छेद' से बाहर निकलने की 'कोशिश' करके देखता। जब उसे लगता कि वह आसानी से छेद से बाहर निकल पा रहा है, तो वह वापस आकर थोड़ा और खा लेता। वह अपनी कमर को उस छेद के आकार से ज़्यादा मोटा नहीं होने देना चाहता था।
दूसरी तरफ, भालू तो लालच में अंधा हो चुका था। उसे शहद बहुत पसंद था। वह बिना कुछ सोचे-समझे एक के बाद एक शहद के डिब्बे और मांस खाता गया। खाते-खाते भालू का पेट फूलकर गुब्बारे की तरह बहुत 'मोटा' हो गया।
किसान का डंडा: अचानक, गोदाम का दरवाज़ा खुला। किसान को किसी के अंदर होने की भनक लग गई थी और वह हाथ में एक भारी डंडा लेकर अंदर आ गया।
किसान को देखते ही भेड़िया तुरंत उस छोटे से छेद की तरफ भागा। चूँकि उसने हिसाब से खाया था, इसलिए वह आसानी से छेद में से 'फिसल कर' बाहर निकल गया और जंगल में भाग गया।
अब भालू की बारी थी। भालू ने भी छेद से बाहर निकलने के लिए अपना सिर अंदर डाला, लेकिन उसका 'फूला हुआ पेट' उस छोटे से छेद में बुरी तरह 'फंस' गया! भालू न तो बाहर निकल पा रहा था और न ही वापस अंदर आ पा रहा था।
किसान ने देखा कि एक मोटा भालू दीवार में फंसा हुआ है। किसान ने अपना डंडा उठाया और उस लालची भालू की इतनी ज़ोरदार पिटाई की कि भालू को अपनी नानी याद आ गई। बड़ी मुश्किल से अपना पेट पिचका कर वह अधमरी हालत में वहाँ से भाग पाया।
नीति / सीख: लालच बुरी बला है। इंसान को हमेशा अपनी 'सीमा' पता होनी चाहिए। जो बिना सोचे-समझे लालच में आकर अपनी सीमाएं पार कर लेता है, वह अंत में हमेशा फँसता है और भारी नुकसान उठाता है।
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