भालू और लोमड़ी — फसल का बंटवारा और बुद्धि का खेल

एक जंगल में एक भालू और एक लोमड़ी रहते थे। भालू शरीर से बहुत ताक़तवर था, लेकिन अक्ल से थोड़ा कमज़ोर था। वहीं, लोमड़ी शरीर से छोटी लेकिन बहुत ही चतुर थी।
एक दिन दोनों ने तय किया कि वे मिलकर खेती करेंगे। भालू ने अपनी ताक़त से ज़मीन खोदी और लोमड़ी ने बीज बोने का काम किया।
फसल बोने के बाद, बंटवारे की बात आई। चालाक लोमड़ी ने भालू से पूछा: "मित्र! बताओ, जब फसल तैयार होगी, तो तुम फसल का कौन सा हिस्सा लोगे? 'ज़मीन के ऊपर' वाला हिस्सा या 'ज़मीन के नीचे' वाला हिस्सा?"
भालू ने सोचा कि ऊपर वाले हिस्से में ही फल लगते हैं। उसने तुरंत कहा: "मैं ज़मीन के ऊपर वाला हिस्सा लूँगा, और तुम ज़मीन के नीचे वाला हिस्सा ले लेना।"
पहली फसल का धोखा: लोमड़ी तो यही चाहती थी! दरअसल, लोमड़ी ने खेत में 'आलू और गाजर' बोए थे, जो ज़मीन के नीचे उगते हैं।
जब फसल तैयार हुई, तो शर्त के अनुसार लोमड़ी ने ज़मीन खोदकर सारे स्वादिष्ट 'आलू और गाजर' (नीचे का हिस्सा) अपने पास रख लिए। और भालू को ज़मीन के 'ऊपर' वाला हिस्सा यानी आलू और गाजर के बेकार पत्ते और डंठल मिले।
भालू बहुत निराश हुआ। उसे समझ आ गया कि लोमड़ी ने उसे बेवकूफ बनाया है। उसने लोमड़ी से कहा: "अगली बार जब हम खेती करेंगे, तो मैं ज़मीन के नीचे वाला हिस्सा लूँगा!" लोमड़ी मुस्कुराकर मान गई।
गेहूँ की फसल: अगली बार जब खेती का समय आया, तो चालाक लोमड़ी ने खेत में 'गेहूँ' बो दिया!
भालू ने इस बार भी अपनी पूरी ताक़त लगाकर खेत की सिंचाई और रखवाली की। जब फसल पक कर तैयार हुई, तो गेहूँ की सुनहरी बालियां ज़मीन के ऊपर हवा में लहरा रही थीं।
शर्त के अनुसार, लोमड़ी ने ज़मीन के 'ऊपर' वाला हिस्सा काटा और सारा स्वादिष्ट गेहूँ अपने गोदाम में भर लिया। और भालू के हिस्से में क्या आया? ज़मीन के 'नीचे' वाला हिस्सा यानी गेहूँ की सूखी और बेकार 'जड़ें'!
भालू को फिर से भूखा रहना पड़ा। वह ज़मीन पर सिर पकड़ कर बैठ गया और समझ गया कि शारीरिक ताक़त से ज़्यादा बुद्धि की ताक़त बड़ी होती है।
नीति / सीख: केवल शारीरिक ताक़त या मेहनत ही काफी नहीं है, सफलता के लिए बुद्धि का इस्तेमाल करना बहुत ज़रूरी है। चालाक लोगों के साथ सौदा करते समय अपनी आँख और कान हमेशा खुले रखने चाहिए।
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