भालू और मधुमक्खियां — एक डंक का गुस्सा और भारी नुकसान

गर्मियों का समय था। एक भालू जंगल में घूम रहा था। उसे बहुत ज़ोरों की भूख लगी थी। चलते-चलते उसकी नज़र एक पेड़ की डाली पर लटके एक बहुत बड़े 'मधुमक्खी के छत्ते' पर पड़ी।
छत्ते से टपकते हुए मीठे शहद की महक सूंघकर भालू के मुँह में पानी आ गया। वह शहद खाने के लिए पेड़ के पास पहुँचा।
जैसे ही भालू ने छत्ते को छूने के लिए अपना पंजा उठाया, छत्ते की पहरेदारी कर रही एक छोटी सी मधुमक्खी उड़कर आई और उसने भालू की 'नाक' पर ज़ोर से एक डंक मार दिया!
भालू का भयंकर क्रोध: नाक पर डंक लगते ही भालू को बहुत तेज़ दर्द हुआ। भालू का स्वभाव बहुत गुस्सैल था। वह छोटी सी मधुमक्खी पर इतना क्रोधित हुआ कि उसका दिमाग खराब हो गया।
भालू ने सोचा: "एक मामूली सी मक्खी की इतनी हिम्मत कि उसने जंगल के इतने बड़े भालू को डंक मारा! मैं इस पूरे छत्ते को ही नष्ट कर दूँगा!"
गुस्से का परिणाम: क्रोध में अंधे होकर भालू ने एक भारी पत्थर उठाया और पूरी ताकत से उस छत्ते पर दे मारा। पत्थर लगते ही छत्ता टूटकर ज़मीन पर गिर गया।
लेकिन यह भालू की ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी!
छत्ता टूटते ही उसके अंदर से 'हज़ारों मधुमक्खियां' एक साथ भिनभिनाती हुई बाहर निकल आईं। जब उन्होंने अपने घर को टूटा हुआ देखा, तो वे भालू पर टूट पड़ीं।
हज़ारों मधुमक्खियों ने भालू के चेहरे, कानों, और शरीर के हर हिस्से पर डंक मारना शुरू कर दिया। भालू दर्द से बुरी तरह चीखने लगा। वह अपनी जान बचाने के लिए जंगल में अंधाधुंध भागने लगा, लेकिन मधुमक्खियां उसके पीछे ही पड़ी थीं।
अंततः भालू को अपनी जान बचाने के लिए पास की एक 'गहरी नदी में छलांग' लगानी पड़ी। पानी के अंदर जाकर ही वह उन मधुमक्खियों से बच पाया, लेकिन तब तक उसका पूरा शरीर डंकों के कारण सूज कर गुब्बारा बन चुका था।
नीति / सीख: गुस्सा हमेशा नुकसान ही पहुँचाता है। एक छोटी सी बात (एक डंक) पर अत्यधिक क्रोध करने के कारण भालू को हज़ारों डंकों का दर्द सहना पड़ा। समझदारी इसी में है कि छोटी-मोटी परेशानियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।
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