लोमड़ी और बाघ — चालाकी का दांव और झूठा खौफ

एक घने जंगल में एक बहुत ही खूंखार बाघ रहता था। एक दिन वह शिकार की तलाश में घूम रहा था कि अचानक उसकी नज़र एक लोमड़ी पर पड़ी। बाघ ने एक ही झपट्टे में लोमड़ी को दबोच लिया।
बाघ ने दहाड़ते हुए कहा: "आज तो मुझे बहुत अच्छा शिकार मिल गया! अब मैं तुझे खाकर अपनी भूख मिटाऊंगा।"
लोमड़ी अंदर से बहुत डर गई थी, लेकिन वह बहुत चालाक थी। उसने घबराने के बजाय अपनी 'बुद्धि' का इस्तेमाल किया।
लोमड़ी का आत्मविश्वास: लोमड़ी ने बाघ की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही रौबदार आवाज़ में कहा: "मुझे खाने की हिम्मत भी मत करना! क्या तुम नहीं जानते कि भगवान ने मुझे इस पूरे जंगल का 'राजा' बनाकर भेजा है? अगर तुमने मुझे छुआ, तो भगवान तुम्हें भस्म कर देंगे!"
बाघ यह सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। उसने हंसते हुए कहा: "तू इतनी सी लोमड़ी और जंगल की राजा? मैं कैसे मान लूँ?"
खौफ का नाटक: लोमड़ी ने तुरंत एक शर्त रखी: "अगर तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है, तो तुम मेरे ठीक पीछे-पीछे चलो। मैं आगे चलूँगी। तुम खुद देख लेना कि जंगल के सारे जानवर मुझे देखकर कैसे डर के मारे भागते हैं।"
बाघ मान गया। योजना के अनुसार लोमड़ी अकड़ कर आगे-आगे चलने लगी और खूंखार बाघ उसके ठीक पीछे-पीछे चलने लगा।
जंगल के जानवरों (हिरण, बंदर, सुअर आदि) ने जब यह नज़ारा देखा, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने देखा कि एक खूंखार बाघ आ रहा है। बाघ को देखते ही सारे जानवर अपनी जान बचाने के लिए बुरी तरह भागने लगे!
बाघ तो लोमड़ी के पीछे चल रहा था। उसे लगा कि जानवर सचमुच 'लोमड़ी' को देखकर डर रहे हैं। बाघ ने सोचा: "अरे बाप रे! यह लोमड़ी तो सच में बहुत खतरनाक है, इसे देखकर तो बड़े-बड़े जानवर भाग रहे हैं। कहीं यह भगवान का रूप तो नहीं?"
बाघ इतना डर गया कि वह भी अपनी जान बचाने के लिए पीछे मुड़ा और वहां से भाग खड़ा हुआ। इस तरह लोमड़ी ने अपनी चालाकी से बिना लड़े ही अपनी जान बचा ली।
नीति / सीख: शारीरिक बल से बड़ा 'बुद्धि का बल' होता है। मुसीबत के समय घबराने के बजाय अगर दिमाग को शांत रखकर हाज़िरजवाबी से काम लिया जाए, तो मौत के मुंह से भी बचा जा सकता है।
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