चमगादड़, पक्षी और जानवर — दलबदलू का कोई दोस्त नहीं होता

बहुत समय पहले की बात है, जंगल में 'पक्षियों' और ज़मीन पर चलने वाले 'जानवरों' के बीच किसी बात को लेकर बहुत भयंकर युद्ध छिड़ गया। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे और जंगल पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहते थे।
इस युद्ध में एक 'चमगादड़' भी था। चमगादड़ की शारीरिक बनावट बहुत अजीब होती है। उसके पास पक्षियों की तरह 'पंख' होते हैं जिससे वह उड़ सकता है, लेकिन उसका मुँह और शरीर चूहों या जानवरों जैसा होता है (जिसमें दाँत होते हैं)।
चमगादड़ बहुत ही स्वार्थी और अवसरवादी था। उसने तय किया कि वह उसी तरफ रहेगा, जो पक्ष युद्ध में 'जीत' रहा होगा।
युद्ध शुरू हुआ। पहले दिन, चील और बाज़ जैसे ताक़तवर पक्षियों ने ज़मीन के जानवरों पर आसमान से ज़ोरदार हमला किया और जानवर हारने लगे। यह देखकर चमगादड़ तुरंत पक्षियों के खेमे में चला गया।
पक्षियों ने उसे रोककर पूछा: "तुम हमारे साथ क्या कर रहे हो? तुम तो एक जानवर लगते हो।" चमगादड़ ने अपने पंख फैलाकर कहा: "अरे नहीं! क्या तुम अंधे हो? देखो मेरे पास पंख हैं। मैं उड़ सकता हूँ। मैं तो पूरी तरह से एक 'पक्षी' हूँ और तुम्हारे साथ हूँ!" पक्षियों ने उसे अपने साथ शामिल कर लिया।
अगले दिन, शेर, भालू और भेड़ियों ने पलटवार किया। जानवरों ने कई पक्षियों को मार गिराया और अब पलड़ा जानवरों का भारी हो गया। पक्षी अपनी जान बचाकर भागने लगे।
यह देखकर चमगादड़ ने तुरंत पाला बदल लिया। वह चुपके से ज़मीन पर आया और जानवरों की सेना में जा घुसा।
जानवरों ने उसे देखकर गुर्राते हुए कहा: "तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम तो आसमान में उड़ने वाले पक्षी हो। हम तुम्हें मार देंगे!" चमगादड़ ने तुरंत अपने दाँत दिखाते हुए कहा: "अरे नहीं भाइयो! पक्षियों के पास कहीं दाँत होते हैं क्या? मेरी चमड़ी देखो, मेरे दाँत देखो। मैं तो चूहों की तरह एक 'जानवर' हूँ और हमेशा से तुम्हारे ही साथ था!" जानवरों ने उसकी बात मान ली।
चमगादड़ पूरे युद्ध के दौरान यही करता रहा। जब जो जीतता, वह उसी की तरफ हो जाता।
कुछ दिनों बाद, पक्षियों और जानवरों को समझ आ गया कि इस युद्ध में दोनों का ही भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने अक्लमंदी दिखाते हुए युद्ध रोक दिया और आपस में एक 'शांति समझौता' कर लिया।
जब शांति हुई, तो पक्षियों और जानवरों के सेनापतियों की बैठक हुई। उस बैठक में उस दलबदलू चमगादड़ की सच्चाई सामने आ गई। दोनों पक्षों को पता चल गया कि चमगादड़ ने दोनों के साथ 'धोखा' किया है और वह किसी का भी सगा नहीं है।
जब चमगादड़ शांति के जश्न में शामिल होने गया, तो जानवरों ने उसे लात मारकर भगा दिया और कहा: "निकल जाओ यहाँ से! तुम हमारे दोस्त नहीं हो।" चमगादड़ उड़कर पक्षियों के पास गया, तो पक्षियों ने उसे चोंच मारकर खदेड़ दिया: "तुम धोखेबाज़ हो! हमारे पास मत आना।"
चमगादड़ पूरी तरह से 'अकेला' हो गया। दोनों पक्षों ने उसका बहिष्कार कर दिया। उसे अपनी जान का इतना डर सताने लगा कि वह दिन की रोशनी में बाहर आना ही छोड़ दिया।
कहा जाता है कि उसी दिन से चमगादड़ अंधेरी 'गुफाओं' में छिपकर रहने लगा और केवल 'रात के अँधेरे' में ही बाहर निकलता है, ताकि उसे कोई पक्षी या जानवर देख न सके।
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