चतुर चूहा और बिल्ली — संकट की दोस्ती और चालाकी का दांव

एक पुराने और विशाल बरगद के पेड़ की जड़ों में 'पलित' नाम का एक बहुत ही चतुर चूहा रहता था। उसी पेड़ की डालियों पर 'लोमश' नाम की एक जंगली बिल्ली भी रहती थी। बिल्ली रोज़ चूहे का शिकार करने की ताक में रहती थी, लेकिन चूहा अपनी चालाकी से हमेशा बच जाता था।
एक रात जंगल में एक शिकारी आया। उसने पेड़ के पास अपना जाल बिछाया। अंधेरे में लोमश बिल्ली उस 'शिकारी के जाल' में बुरी तरह फंस गई! वह बहुत छटपटाई, लेकिन बाहर नहीं निकल सकी।
सुबह हुई। चूहे ने अपने बिल से बाहर आकर देखा कि उसकी सबसे बड़ी दुश्मन (बिल्ली) जाल में फंसी हुई है। चूहा बहुत खुश हुआ।
परंतु चूहे की खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी। उसने देखा कि आसमान में एक खूंखार 'उल्लू' उस पर नज़र गड़ाए बैठा है, और पास ही झाड़ियों में एक 'नेवला' उसे खाने के लिए घात लगाए बैठा है।
चूहे के आगे कुआँ और पीछे खाई थी! अगर वह बिल की तरफ भागता, तो नेवला पकड़ लेता। अगर वहीं खड़ा रहता, तो उल्लू झपट्टा मार देता।
संकट की संधि: चतुर चूहे ने तुरंत अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए। वह सीधा उस जाल में फंसी बिल्ली के पास गया और बोला: "बिल्ली मौसी! आज हम दोनों की जान खतरे में है। तुम जाल में फंसी हो और मुझे उल्लू और नेवले ने घेर रखा है। चलो एक सौदा करते हैं। तुम मुझे अपने जाल के अंदर अपनी 'शरण' में छिपा लो, जिससे उल्लू और नेवला मुझे छू न सकें। इसके बदले में, मैं अपने तेज़ दांतों से यह जाल कुतर कर तुम्हें आज़ाद कर दूँगा!"
बिल्ली को अपनी जान बचानी थी, उसने तुरंत चूहे का प्रस्ताव मान लिया।
चूहा जाल के अंदर घुसकर बिल्ली के पेट के नीचे छिप गया। बिल्ली के पास चूहे को देखकर, उल्लू और नेवला दोनों निराश होकर वहाँ से चले गए।
चालाकी का दांव: खतरा टलते ही बिल्ली ने चूहे से कहा: "चूहे भाई! अब जल्दी से मेरा जाल काटो।"
परंतु चूहा बहुत चालाक था। वह जानता था कि अगर उसने जाल अभी काट दिया, तो आज़ाद होते ही बिल्ली सबसे पहले उसे ही खा जाएगी।
इसलिए चूहा बहुत ही 'धीमी गति' से जाल कुतरने लगा। वह बस एक-एक धागा काटता और रुक जाता। बिल्ली चिल्लाती रही, "जल्दी कर! शिकारी आने वाला है!"
चूहा आराम से कहता रहा, "मौसी, चिंता मत करो, मैं समय पर काम पूरा कर दूँगा।"
कुछ देर बाद दूर से शिकारी आता हुआ दिखाई दिया। शिकारी को देखकर बिल्ली के प्राण सूख गए।
जैसे ही शिकारी बिल्कुल पास आ गया और बिल्ली मौत के डर से कांपने लगी, ठीक उसी 'आखिरी सेकंड' पर चूहे ने जाल का 'अंतिम धागा' कुतर दिया!
जाल कटते ही बिल्ली अपनी जान बचाने के लिए पूरी ताकत से पेड़ के ऊपर भाग गई। उसे चूहे को पकड़ने या खाने का एक सेकंड का भी समय नहीं मिला। उधर चूहा भी बिजली की फुर्ती से अपने बिल में घुस गया!
अगले दिन बिल्ली ने पेड़ से चूहे को आवाज़ लगाई: "मित्र! बाहर आओ। हमने एक-दूसरे की जान बचाई है, अब हम हमेशा पक्के दोस्त बनकर रहेंगे।"
चूहे ने बिल के अंदर से मुस्कुराते हुए जवाब दिया: "मौसी! हमारी दोस्ती केवल 'संकट' के समय तक थी। अब संकट खत्म हो गया है और प्रकृति का नियम वापस आ गया है— तुम शिकारी हो और मैं शिकार! संकट में बनाए गए दुश्मन से कभी पक्की दोस्ती नहीं करनी चाहिए।"
नीति / सीख: मुसीबत के समय अपने दुश्मन से भी हाथ मिला लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन संकट खत्म होने के बाद ऐसे 'स्वाभाविक दुश्मनों' पर कभी आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।
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