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📜 पंचतंत्र

मूर्ख ब्राह्मण और ठग — झूठ का मायाजाल और कानों का कच्चापन

पंचतंत्र — विश्नु शर्मा5 मिनट का पठन
मूर्ख ब्राह्मण और ठग — झूठ का मायाजाल और कानों का कच्चापन

एक गाँव में 'मित्रशर्मा' नाम का एक सीधा-सादा ब्राह्मण रहता था। एक दिन उसने पास के गाँव से यज्ञ के लिए एक बहुत ही स्वस्थ और सुंदर 'बकरी' खरीदी। ब्राह्मण ने उस बकरी को अपने कंधों पर उठा लिया और अपने गाँव की ओर पैदल चल पड़ा।

रास्ते में तीन बहुत ही चालाक 'ठगों' ने ब्राह्मण को देखा। उनके मुँह में पानी आ गया। उन्होंने सोचा, "यह बकरी तो बहुत मोटी-ताज़ी है। किसी तरह इस ब्राह्मण को बेवकूफ बनाकर यह बकरी छीन लेनी चाहिए!"

ठगों ने एक योजना बनाई। वे तीनों उस रास्ते पर कुछ-कुछ दूरी पर जाकर खड़े हो गए, जहाँ से ब्राह्मण को गुज़रना था।

पहला और दूसरा झूठ: ब्राह्मण अपनी धुन में बकरी को कंधे पर लिए चला जा रहा था। तभी उसे पहला ठग मिला। ठग ने हैरानी का नाटक करते हुए कहा: "प्रणाम पंडित जी! यह क्या अनर्थ कर रहे हैं आप? एक पवित्र ब्राह्मण होकर आपने अपने कंधों पर यह गंदा 'कुत्ता' क्यों उठाया हुआ है?"

ब्राह्मण को बहुत गुस्सा आया। उसने डांटते हुए कहा: "क्या तू अंधा है? तुझे यह सुंदर बकरी कुत्ता नज़र आ रही है? जा अपना काम कर!" ब्राह्मण आगे बढ़ गया।

थोड़ी दूर चलने के बाद उसे दूसरा ठग मिला। दूसरे ठग ने अपना नाक सिकोड़ते हुए कहा: "राम-राम पंडित जी! कैसी अजीब बात है! आप जैसे ज्ञानी इंसान ने अपने कंधों पर एक 'मरा हुआ बछड़ा' क्यों उठाया हुआ है? आपको तो स्नान करना पड़ेगा!"

अब ब्राह्मण थोड़ा घबरा गया। उसने बकरी को कंधे से उतार कर देखा। बकरी ज़िंदा थी। उसने सोचा, "शायद उस आदमी की आँखें खराब होंगी।" उसने बकरी को फिर कंधे पर उठाया और चलने लगा।

तीसरा वार और मायाजाल: थोड़ी और दूर जाने पर रास्ते में तीसरा ठग मिला। तीसरा ठग ब्राह्मण को देखते ही पीछे हट गया और डरते हुए बोला: "हे भगवान! पंडित जी, क्या आप पागल हो गए हैं? आपने अपने कंधों पर इस अछूत और गंदे 'गधे' को क्यों ढो रहे हैं? लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे!"

यह सुनते ही ब्राह्मण के पसीने छूट गए। उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया।

उसने सोचा, "एक आदमी अंधा हो सकता है, दो लोग अंधे हो सकते हैं, लेकिन तीन-तीन लोग झूठ थोड़ी बोलेंगे! यह जानवर कभी कुत्ता बन जाता है, कभी मरा हुआ बछड़ा और कभी गधा! इसका मतलब... यह कोई बकरी नहीं, बल्कि रूप बदलने वाला कोई 'राक्षस या भूत' है, जो मुझे खाने के लिए मेरे कंधे पर बैठा है!"

डर के मारे ब्राह्मण की रूह कांप गई। उसने तुरंत उस बकरी को अपने कंधे से नीचे ज़मीन पर फेंक दिया और बिना पीछे मुड़े पूरी ताकत से अपने गाँव की ओर भाग गया।

ब्राह्मण के जाते ही वे तीनों ठग वहाँ इकट्ठा हुए, उन्होंने उस मोटी-ताज़ी बकरी को उठाया और खुशी-खुशी उसकी दावत उड़ाने चले गए।

नीति / सीख: लगातार बोला गया 'झूठ' भी कमज़ोर दिमाग वालों को 'सच' लगने लगता है। इंसान को दूसरों की बातों (अफवाहों) में आने के बजाय अपने स्वयं के ज्ञान और अपनी आँखों पर भरोसा करना चाहिए।

🎉 कहानी समाप्त

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