चूहा और मेंढक — बेमेल दोस्ती और घातक मज़ाक

एक बार एक चूहे और एक मेंढक के बीच बहुत गहरी दोस्ती हो गई। चूहा ज़मीन पर रहता था और मेंढक पानी के पास। दोनों रोज़ मिलते और घंटों बातें करते थे।
एक दिन मेंढक के मन में एक अजीब और स्वार्थी विचार आया। उसने सोचा, "चूहा तो हमेशा ज़मीन पर ही रहता है, अगर वह मेरे साथ पानी के अंदर भी चले, तो हम सारा समय साथ बिता सकेंगे।"
मेंढक ने चूहे से कहा: "मित्र! हम रोज़ मिलने के लिए इतना इंतज़ार करते हैं। क्यों न हम एक-दूसरे के पैरों को एक मज़बूत 'धागे' से बांध लें? इस तरह हम हमेशा एक साथ रहेंगे और कभी अलग नहीं होंगे।"
चूहा बहुत भोला था और मेंढक की चालाकी नहीं समझ पाया। उसने सोचा कि यह दोस्ती की निशानी है और वह राज़ी हो गया। मेंढक ने एक मज़बूत धागा लिया और उसका एक सिरा अपने पैर में और दूसरा सिरा चूहे के पैर में बांध दिया।
घातक मज़ाक: कुछ देर ज़मीन पर घूमने के बाद, मेंढक को अपने घर (तालाब) की याद आई। वह भूल गया कि चूहा पानी में नहीं रह सकता। मेंढक ने सीधा तालाब के गहरे पानी में छलांग लगा दी!
धागे से बंधा होने के कारण बेचारा चूहा भी पानी में खिंचता चला गया।
चूहा पानी में तैरना नहीं जानता था। उसने मेंढक से मिन्नतें की: "मित्र! मुझे बाहर निकालो, मैं डूब रहा हूँ!"
परंतु मेंढक पानी के अंदर अपने मज़े में था, उसने चूहे की चीखें नहीं सुनीं। कुछ ही देर में पानी में डूबने के कारण चूहे की मौत हो गई। मरने के बाद चूहे का शरीर पानी के ऊपर 'तैरने' लगा, जबकि मेंढक अभी भी पानी के अंदर था और दोनों एक ही धागे से बंधे थे।
तभी आसमान में उड़ते हुए एक खूंखार 'बाज़' की नज़र पानी पर तैरते हुए मरे हुए चूहे पर पड़ी। बाज़ ने तेज़ी से झपट्टा मारा और चूहे को अपने पंजों में दबाकर आसमान में उड़ गया।
चूँकि मेंढक का पैर भी उसी धागे से चूहे के साथ बंधा हुआ था, इसलिए मेंढक भी पानी से बाहर खिंच गया और आसमान में लटकने लगा!
बाज़ ने अपने घोंसले में जाकर पहले चूहे को खाया और फिर उस स्वार्थी मेंढक को भी अपना शिकार बना लिया।
नीति / सीख: दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला अंत में खुद उसी गड्ढे में गिरता है। जो लोग अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को खतरे में डालते हैं, उनका अपना विनाश भी निश्चित होता है।
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