लोमड़ी और लकड़हारा — कथनी और करनी का अंतर

एक जंगल में शिकारियों का एक दल शिकारी कुत्तों के साथ एक लोमड़ी का पीछा कर रहा था। लोमड़ी अपनी जान बचाने के लिए पूरी ताकत से भाग रही थी, लेकिन शिकारी बहुत करीब आ चुके थे।
भागते-भागते लोमड़ी को एक लकड़हारा मिला, जो अपनी झोपड़ी के बाहर लकड़ी काट रहा था।
लोमड़ी ने कांपते हुए लकड़हारे से कहा: "भाई! शिकारी मुझे मारने के लिए मेरे पीछे पड़े हैं। कृपया मुझे बचा लो और मुझे छिपने की कोई जगह बता दो।"
लकड़हारे ने उसे अपनी 'झोपड़ी' की तरफ इशारा करते हुए कहा: "तुम तुरंत मेरी झोपड़ी के अंदर जाकर छिप जाओ। मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगा।" लोमड़ी जल्दी से झोपड़ी में घुस गई।
शिकारियों का आगमन और धोखा: कुछ ही पलों में शिकारी वहां पहुँच गए। उन्होंने लकड़हारे से पूछा: "क्या तुमने अभी-अभी यहां से किसी लोमड़ी को भागते हुए देखा है?"
लकड़हारे ने अपने मुँह से तो कहा: "नहीं! मैंने किसी लोमड़ी को नहीं देखा।" परंतु बोलते समय उसने अपने 'हाथ की उंगली' से अपनी झोपड़ी की तरफ इशारा कर दिया!
शिकारियों का ध्यान उसकी उंगली के इशारे पर नहीं गया। उन्होंने केवल उसकी 'आवाज़' सुनी और यह सोचकर वहां से चले गए कि लोमड़ी आगे भाग गई होगी।
जब शिकारियों के जाने के बाद लोमड़ी झोपड़ी से बाहर निकली, तो वह बिना एक शब्द कहे, चुपचाप जंगल की ओर जाने लगी।
लकड़हारे ने पीछे से आवाज़ दी: "अरे लोमड़ी! तुम कितनी एहसानफरामोश हो? मैंने तुम्हारी जान बचाई और तुम मुझे 'धन्यवाद' कहे बिना ही जा रही हो?"
लोमड़ी ने पलटकर देखा और कहा: "अगर तुम्हारी 'उंगली' तुम्हारे 'शब्दों' का साथ देती, तो मैं तुम्हें ज़रूर धन्यवाद कहती। तुम्हारी ज़ुबान ने तो मुझे बचाया, लेकिन तुम्हारे हाथों ने मेरे साथ धोखा किया था!"
नीति / सीख: कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। जो इंसान मुँह से मीठी बातें करता है लेकिन अपने व्यवहार (या इशारों) से धोखा देता है, वह कभी भी सम्मान या धन्यवाद का पात्र नहीं होता।
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