चूहों की सभा — बिल्ली के गले में घंटी और खयाली पुलाव

एक बहुत बड़े गोदाम में सैकड़ों चूहे रहा करते थे। वहाँ उन्हें खाने की कोई कमी नहीं थी, परंतु उनकी एक बहुत बड़ी समस्या थी— उस घर की 'बिल्ली'।
वह बिल्ली बहुत ही खामोशी से शिकार करती थी। उसके पंजों की बिल्कुल आवाज़ नहीं आती थी। वह अचानक हमला करती और रोज़ किसी न किसी चूहे को अपना शिकार बना लेती थी। चूहों का जीना हराम हो गया था।
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए चूहों ने एक 'महासभा' बुलाई। सभी चूहे अपने-अपने विचार देने लगे।
युवा चूहे का शानदार सुझाव: तभी एक युवा और जोशीले चूहे ने खड़े होकर कहा: "भाइयो! बिल्ली से हमारी जान इसलिए जाती है क्योंकि हमें उसके आने की 'आवाज़' नहीं सुनाई देती। मेरे पास एक बहुत ही शानदार योजना है! क्यों न हम एक छोटी सी 'घंटी' लेकर उसे एक लाल रिबन में बाँधें, और चुपके से जाकर उस घंटी को 'बिल्ली के गले में बाँध दें'?"
युवा चूहे ने आगे कहा: "जब भी बिल्ली चलेगी, तो घंटी बजेगी— 'टन... टन...'! और हम उस आवाज़ को सुनकर समय रहते अपने बिलों में छिप जाएँगे!"
यह सुनकर सभा में खुशी की लहर दौड़ गई। सभी चूहे खुशी से नाचने लगे और युवा चूहे की अक्लमंदी की तारीफ करने लगे। उन्हें लगा कि उनकी समस्या हमेशा के लिए सुलझ गई है।
बुज़ुर्ग चूहे का सवाल: तभी कोने में बैठा एक बहुत ही बुज़ुर्ग और अनुभवी चूहा खड़ा हुआ। उसने खाँसते हुए सभी को शांत किया और कहा: "योजना तो बहुत ही शानदार है! इससे हमारी जान ज़रूर बच जाएगी... लेकिन मेरा एक छोटा सा सवाल है।"
सभी ने पूछा: "क्या सवाल है?"
बुज़ुर्ग चूहे ने गंभीर आवाज़ में पूछा: "योजना बन गई, घंटी भी आ जाएगी... लेकिन यह बताओ कि वह घंटी लेकर 'बिल्ली के गले में बाँधने कौन जाएगा?'"
यह सवाल सुनते ही पूरी सभा में 'सन्नाटा' छा गया। जो चूहे अभी तक नाच रहे थे, वे एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिल्ली के पास जाकर उसके गले में घंटी बाँध सके। योजना धरी की धरी रह गई।
नीति / सीख: खयाली पुलाव पकाना या योजनाएँ बनाना बहुत आसान है, लेकिन उन योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर 'लागू करना' सबसे मुश्किल काम होता है। जो काम असलियत में किया ही न जा सके, उसकी योजना बनाना व्यर्थ है।
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