शेर और बिल्ली — स्वार्थ की दावत और उपयोगिता का अंत

एक जंगल में एक शेर रहता था। उसकी गुफा बहुत बड़ी थी, लेकिन उस गुफा में 'चूहों' ने बहुत आतंक मचा रखा था। जब भी शेर शिकार करके सोता, चूहे बाहर निकलते और उसकी पूंछ और अयाल के बाल कुतरने लगते।
शेर चूहों के बिल में घुस नहीं सकता था, इसलिए वह बहुत परेशान था।
अपनी इस परेशानी को दूर करने के लिए शेर ने एक 'बिल्ली' को अपनी गुफा में नौकरी पर रख लिया। शेर ने बिल्ली से कहा: "तुम्हारा काम केवल यहाँ रहकर चूहों को डराना है। बदले में, मैं तुम्हें रोज़ अपने शिकार का सबसे बेहतरीन माँस खाने को दूँगा।"
बिल्ली की शाही दावत: बिल्ली के तो मज़े आ गए। बिल्ली के डर से सारे चूहे अपने बिलों के अंदर दुबक कर बैठ गए और शेर को चैन की नींद आने लगी।
चूँकि चूहे अभी भी ज़िंदा थे और कभी-कभी बाहर झांकते थे, इसलिए शेर को बिल्ली की 'ज़रूरत' थी। शेर रोज़ बिल्ली को बहुत प्यार करता और उसे ताज़ा माँस खिलाता। बिल्ली खा-खाकर बहुत मोटी हो गई।
बिल्ली ने सोचा: "अगर मैं सारे चूहों को एक साथ मार दूँगी, तो शायद मेरा महत्व कम हो जाएगा।" इसलिए वह जानबूझकर रोज़ केवल एकाध चूहे को ही मारती थी। यह सिलसिला कई महीनों तक चला।
स्वार्थ का अंत: एक दिन बिल्ली से गलती हो गई। उसने शिकार के जोश में आकर गुफा के 'आखिरी बचे हुए चूहे' को भी पकड़ कर मार डाला!
अगले दिन जब बिल्ली शेर के पास माँस माँगने गई, तो शेर ने उसे भगा दिया। बिल्ली ने हैरानी से पूछा: "महाराज! आप मुझे माँस क्यों नहीं दे रहे? मैंने तो आपकी गुफा के सारे चूहों को मार दिया है!"
शेर ने बहुत ही कड़वा जवाब दिया: "बिल्कुल सही! अब गुफा में एक भी चूहा नहीं है, तो मुझे अब तुम्हारी 'कोई ज़रूरत नहीं' है। मैं तुम्हें अपना कीमती माँस मुफ्त में क्यों दूँ? अब यहाँ से जाओ और अपना शिकार खुद ढूँढो!"
बेचारी बिल्ली को अपनी नौकरी और शाही दावत गँवानी पड़ी, क्योंकि उसने शेर की समस्या को पूरी तरह खत्म कर दिया था।
नीति / सीख: स्वार्थी लोग केवल तब तक आपका सम्मान करते हैं, जब तक उन्हें आपकी 'ज़रूरत' होती है। काम निकल जाने के बाद स्वार्थी इंसान तुरंत मुँह फेर लेता है।
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