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दो बिल्लियाँ और चतुर बंदर — रोटी का बँटवारा और तीसरे का फ़ायदा

शिक्षाप्रद कहानियाँ4 मिनट का पठन
दो बिल्लियाँ और चतुर बंदर — रोटी का बँटवारा और तीसरे का फ़ायदा

एक गाँव में दो बिल्लियाँ रहती थीं— एक काली और एक सफेद। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। एक दिन दोनों को बहुत ज़ोरों की भूख लगी थी और वे भोजन की तलाश में भटक रही थीं।

तभी उन्हें एक घर के बाहर एक बहुत ही स्वादिष्ट और ताज़ी 'रोटी' का टुकड़ा पड़ा हुआ मिला। दोनों बिल्लियों ने एक साथ उस रोटी पर झपट्टा मारा।

अब समस्या यह थी कि रोटी एक थी और खाने वाली दो। काली बिल्ली ने कहा: "यह रोटी पहले मैंने देखी थी, इसलिए यह मेरी है!" सफेद बिल्ली ने गुर्राकर कहा: "नहीं! इसे ज़मीन से पहले मैंने उठाया था, इसलिए यह मेरी है!"

दोनों बिल्लियाँ रोटी के लिए आपस में बुरी तरह लड़ने-झगड़ने लगीं। कोई भी दूसरे को ज़्यादा हिस्सा देने के लिए तैयार नहीं थी।

चतुर बंदर का आगमन: पास ही एक पेड़ पर एक बहुत ही चालाक 'बंदर' बैठा यह सब तमाशा देख रहा था। उसने सोचा कि इन मूर्ख बिल्लियों की लड़ाई का फ़ायदा उठाया जाए।

बंदर हाथ में एक 'तराज़ू' लेकर पेड़ से नीचे उतरा और बहुत ही गंभीर आवाज़ में बोला: "अरे बिल्लियों! तुम दोनों इतनी अच्छी दोस्त होकर एक मामूली सी रोटी के लिए क्यों लड़ रही हो? लाओ, यह रोटी मुझे दे दो। मैं इस तराज़ू से तौलकर तुम दोनों को बिल्कुल 'बराबर-बराबर' हिस्सा बाँट दूँगा।"

बिल्लियाँ बंदर की बातों में आ गईं और उन्होंने रोटी उसे दे दी।

बंदर ने रोटी के दो टुकड़े किए और तराज़ू के दोनों पलड़ों पर रख दिए। उसने तराज़ू उठाया और देखा।

बंदर ने कहा: "अरे! यह दायाँ टुकड़ा थोड़ा भारी हो गया है। रुको, मैं इसे खाकर बराबर कर देता हूँ।" यह कहकर बंदर ने भारी टुकड़े में से एक बड़ा बाइट खा लिया।

अब बायाँ पलड़ा भारी हो गया। बंदर ने कहा: "ओहो! अब तो यह वाला भारी हो गया। इसे भी बराबर करना पड़ेगा।" फिर उसने बाएँ टुकड़े में से एक बाइट खा लिया।

यही खेल चलता रहा। कभी यह टुकड़ा भारी होता, कभी वह टुकड़ा भारी होता। बंदर "बराबर करने" के बहाने दोनों टुकड़ों को बारी-बारी से खाता गया।

बिल्लियाँ बेचारी मुँह बाए उस तराज़ू को देखती रहीं। धीरे-धीरे रोटी के दोनों टुकड़े बिल्कुल छोटे-छोटे रह गए।

जब बिल्लियों को बंदर की चालाकी समझ आई, तो वे घबराकर बोलीं: "बंदर भाई! रहने दो। तुम बँटवारा मत करो। ये बचे हुए छोटे टुकड़े ही हमें दे दो, हम आपस में बाँट लेंगी।"

बंदर ने ज़ोर से ठहाका लगाया और कहा: "अरे! ऐसे कैसे दे दूँ? मैंने इतनी देर से जो 'न्याय' करने की मेहनत की है, यह बचा हुआ टुकड़ा तो मेरी 'फीस' है!"

यह कहकर बंदर ने बचे हुए दोनों टुकड़े भी अपने मुँह में डाले और छलाँग मारकर पेड़ पर भाग गया। दोनों मूर्ख बिल्लियाँ भूखी की भूखी रह गईं और अपने आपसी झगड़े पर पछताती रहीं।

🎉 कहानी समाप्त

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