हवा और सूरज की शर्त — क्रोध बनाम विनम्रता की जीत

एक बार 'हवा' और 'सूरज' के बीच एक बहुत बड़ी बहस छिड़ गई।
हवा ने बड़े ही अहंकार के साथ कहा: "मैं इस दुनिया में सबसे ज़्यादा ताक़तवर हूँ! मैं चाहूँ तो बड़े-बड़े पेड़ों को उखाड़ सकती हूँ और समंदर में भयंकर तूफान ला सकती हूँ। तुम्हारे अंदर मेरी जैसी ताक़त कहाँ?"
सूरज ने बहुत ही शांति से मुस्कुराते हुए जवाब दिया: "ताक़त का मतलब केवल शोर मचाना या तबाही लाना नहीं होता। शांति और गर्माहट में भी बहुत ताक़त होती है।"
लेकिन हवा अपनी ज़िद पर अड़ी रही। तभी दोनों की नज़र ज़मीन पर एक पगडंडी पर पड़ी। वहाँ से एक राहगीर गुज़र रहा था। उसने ठंड से बचने के लिए एक बहुत ही 'मोटा और भारी कोट' पहना हुआ था।
शर्त और हवा का क्रोध: सूरज ने कहा: "चलो एक शर्त लगाते हैं। हम दोनों में से जो भी अपनी ताक़त से इस राहगीर का 'कोट उतरवा देगा', वही सबसे ज़्यादा ताक़तवर माना जाएगा।" हवा ने यह शर्त तुरंत मान ली। सूरज बादलों के पीछे छिप गया और हवा को पहला मौका दिया।
हवा ने अपनी पूरी ताक़त लगाई और बहुत ज़ोरों से तूफानी रूप में बहना शुरू कर दिया। ठंडी और तेज़ हवा राहगीर से टकराने लगी।
हवा को लगा कि राहगीर अपना कोट फेंक देगा, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा! हवा जितनी तेज़ और 'क्रोधित' होती गई, राहगीर को उतनी ही ज़्यादा ठंड लगने लगी। उसने अपना कोट उतारने के बजाय, उसे अपने शरीर से और भी 'कसकर लपेट लिया' ताकि हवा अंदर न जा सके।
हवा ने अपनी पूरी जान लगा दी, लेकिन वह उस राहगीर का कोट नहीं उतरवा सकी। अंत में हवा बुरी तरह थक कर हार मान गई।
अब सूरज की बारी थी। सूरज बादलों के पीछे से बाहर निकला। उसने हवा की तरह कोई ज़बरदस्ती या क्रोध नहीं किया। इसके बजाय, सूरज ने अपनी बहुत ही 'कोमल और गर्म किरणें' राहगीर पर डालना शुरू किया।
मौसम अचानक सुहावना हो गया। राहगीर को ठंड लगनी बंद हो गई। उसने राहत की साँस ली और अपने कोट के बटन खोल दिए।
सूरज ने धीरे-धीरे अपनी चमक और गर्माहट थोड़ी और बढ़ा दी। अब राहगीर को गर्मी लगने लगी और उसे पसीना आने लगा। उस गर्मी से बचने के लिए राहगीर ने खुशी-खुशी अपनी मर्ज़ी से अपना 'कोट उतार दिया' और उसे अपने कंधे पर रखकर आराम से चलने लगा।
हवा का सिर शर्म से झुक गया। सूरज ने साबित कर दिया था कि ज़बरदस्ती से ज़्यादा ताक़त प्यार और विनम्रता में होती है।
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