दो मेंढक और दूध का बर्तन — हार न मानने की ज़िद और जीवन रक्षा

एक गाँव में एक डेयरी (दूध का तबेला) थी। एक रात भोजन की तलाश में फुदकते हुए दो मेंढक उस डेयरी में घुस गए। डेयरी के अंदर बहुत अँधेरा था।
फुदकते-फुदकते अचानक दोनों मेंढक छपाक् से एक बहुत बड़े और गहरे बर्तन में गिर पड़े। जब उन्होंने संभल कर देखा, तो पता चला कि वह बर्तन 'ताज़े दूध' से पूरा भरा हुआ था।
बर्तन के किनारे बहुत चिकने और ऊँचे थे, और दूध बहुत गहरा था। दोनों मेंढक बाहर निकलने के लिए दूध में तैरने लगे और ऊपर उछलने की कोशिश करने लगे। लेकिन बर्तन इतना चिकना था कि वे बार-बार फिसल कर वापस दूध में गिर जाते।
निराशा और मौत: काफी देर तक तैरने और छलाँग मारने के बाद दोनों मेंढक बहुत बुरी तरह थक गए।
पहले मेंढक ने निराशा से कहा: "भाई! अब कुछ नहीं हो सकता। इस बर्तन के किनारे बहुत ऊँचे हैं और हम बाहर नहीं निकल सकते। मेरी टाँगें दुखने लगी हैं। यूँ बेकार में हाथ-पैर मारने से क्या फायदा? हमारी मौत पक्की है, इसलिए बेहतर है कि बिना तड़पे अपनी हार मान ली जाए।"
यह कहकर उस पहले (निराश) मेंढक ने तैरना बंद कर दिया। उसने अपने हाथ-पैर मारने छोड़ दिए और वह धीरे-धीरे दूध में डूबकर मर गया।
लेकिन दूसरे मेंढक का स्वभाव बिल्कुल अलग था। उसने सोचा: "भले ही मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं है, लेकिन मैं इतनी आसानी से अपनी जान नहीं दूँगा! जब तक मेरे शरीर में साँस है, मैं तैरना बंद नहीं करूँगा।"
वह दूसरा मेंढक लगातार अपने पैरों से दूध को 'मथता' (Churning) रहा। वह घंटों तक बिना रुके तैरता रहा और दूध में ज़ोर-ज़ोर से अपने पैर चलाता रहा।
मेंढक के इस लगातार संघर्ष का एक चमत्कारिक परिणाम हुआ!
घंटों तक पैरों से दूध मथे जाने के कारण, दूध गाढ़ा होने लगा और अचानक उस दूध में से 'मक्खन का एक बड़ा और ठोस गोला' निकल कर ऊपर तैरने लगा।
मेंढक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह तुरंत तैरकर उस ठोस 'मक्खन के गोले' के ऊपर चढ़कर बैठ गया। अब उसे छलाँग लगाने के लिए एक मज़बूत आधार मिल गया था।
उसने अपनी पूरी ताक़त से मक्खन पर पैर रखकर एक लंबी छलाँग लगाई और बर्तन से बाहर ज़मीन पर आ गिरा। उसकी हार न मानने की ज़िद ने उसकी जान बचा ली थी!
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