गधा और सूअर — मुफ्त की दावत और कसाई का चाकू

एक किसान के पास एक गधा था। गधा सुबह से लेकर शाम तक खेतों में कड़ी मेहनत करता था, भारी बोरे ढोता था और अंत में उसे खाने के लिए केवल 'रूखी-सूखी घास' और भूसा ही मिलता था।
उसी किसान ने अपने बाड़े में एक सूअर भी पाला हुआ था। सूअर को कोई काम नहीं करना पड़ता था। वह दिन भर कीचड़ में लेटा रहता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि किसान उस सूअर को रोज़ खाने के लिए बहुत ही 'अच्छा और स्वादिष्ट भोजन' — अनाज, फल और बचा हुआ स्वादिष्ट खाना देता था।
गधे की जलन: रोज़ मुफ्त का और स्वादिष्ट खाना खा-खाकर सूअर बहुत ही 'मोटा-ताज़ा' हो गया था।
गधा रोज़ सूअर को देखता और मन ही मन बहुत जलता था। गधा ईश्वर से शिकायत करता: "हे भगवान! यह कैसा अन्याय है? मैं दिन-रात मज़दूरी करता हूँ और मुझे सूखी घास मिलती है। और यह आलसी सूअर कोई काम नहीं करता, फिर भी इसे छप्पन भोग मिलते हैं। काश! मेरी ज़िंदगी भी इस सूअर जैसी होती।"
सच्चाई का कड़वा दिन: गधे की यह जलन कई महीनों तक चलती रही।
फिर एक दिन, गाँव में कोई बहुत बड़ा त्योहार आया। किसान के घर बहुत सारे मेहमान आने वाले थे।
सुबह-सुबह गधे ने देखा कि किसान बाड़े में एक 'कसाई' को लेकर आया है। कसाई के हाथ में एक बहुत बड़ा और तेज़ चाकू था।
किसान और कसाई सीधे उस मोटे सूअर के पास गए। उन्होंने सूअर को पकड़ा और उसे दावत का मांस बनाने के लिए 'काट डाला'।
यह खौफनाक नज़ारा देखकर गधे की आत्मा काँप गई! गधे को तुरंत सारी सच्चाई समझ में आ गई।
उसे समझ आ गया कि किसान उस सूअर को वह 'स्वादिष्ट और मुफ्त का भोजन' इसलिए नहीं दे रहा था क्योंकि वह सूअर से प्यार करता था, बल्कि वह तो सूअर को 'दावत के लिए मोटा कर रहा था'!
गधे ने राहत की सांस ली और ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहा: "हे भगवान! आपका लाख-लाख शुक्र है कि आपने मुझे गधा बनाया। मैं अपनी इस रूखी-सूखी घास और कड़ी मेहनत में ही बहुत खुश हूँ। कम से कम मेरी जान तो सुरक्षित है।"
नीति / सीख: दूसरों की बिना मेहनत की 'मुफ्त की सुख-सुविधाओं' को देखकर कभी जलन नहीं करनी चाहिए। जो चीज़ बिना मेहनत (मुफ्त) के मिलती है, उसकी अक्सर बहुत बड़ी और भयानक 'कीमत' चुकानी पड़ती है। मेहनत की सूखी रोटी हमेशा सुरक्षित होती है।
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