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हरे रंग का महल

अमन खंडेलवाल5 मिनट का पठन
हरे रंग का महल

'चन्द्रगिरी' नाम के एक बेहद विशाल और भव्य राज्य में महाराज 'विक्रम सिंह' राज करते थे। उनका दरबार अजीबोगरीब और नामुमकिन सवालों के लिए मशहूर था। उनका नियम बिल्कुल साफ था— "जो मेरी चुनौती पूरी करेगा, उसे मुँह-मांगा इनाम दिया जाएगा और जो चुनौती स्वीकार करके हार मान लेगा, उसे कालकोठरी (जेल) की हवा खानी पड़ेगी!"

एक दिन महाराज अपने सफेद संगमरमर के महल से बोर हो गए। उन्होंने दरबार में एक अजीब सी घोषणा की: "मुझे अपने महल का रंग बदलना है!"

"मैं चाहता हूँ कि कल सुबह तक मेरे महल की सारी दीवारें, फर्श, छतें और यहाँ तक कि दरबार का सारा सामान भी मुझे बिल्कुल 'हरे' रंग का नज़र आए। लेकिन... शर्त यह है कि इसे रंगने के लिए केवल 'एक छोटी मटकी' हरा रंग ही दिया जाएगा!"

पूरा दरबार सन्न रह गया! इतने विशाल महल को एक छोटी मटकी रंग से रंग करना तो नामुमकिन था।

तभी राज्य का सबसे नामचीन और अमीर चित्रकार 'रंगनाथ' आगे आया। वह बहुत ही आत्मविश्वास से भरा हुआ था। उसे लगा कि वह पानी मिलाकर रंग बढ़ा लेगा। उसने चुनौती स्वीकार कर ली।

लेकिन जब रंगनाथ ने उस एक मटकी रंग को पानी के एक बड़े टैंक में मिलाया, तो रंग का असर ही खत्म हो गया। उसने वह गंदा पानी महल की दीवारों पर फेंका, जिससे महल हरा तो नहीं हुआ, लेकिन बहुत गंदा ज़रूर हो गया।

राजा यह सब देखकर बहुत क्रोधित हुए। नियम के अनुसार, राजा ने गुस्से में चित्रकार रंगनाथ को तुरंत कालकोठरी में डलवा दिया। अब पूरे दरबार में खामोशी छा गई।

इसी प्रकार कुछ दिनों तक एक एक करके कई बुद्धिमान लोग आए और हारकर जेल में चले गए।

उसी राज्य में 'केशव' नाम का एक गरीब मज़दूर रहता था। वह बहुत चतुर और समझदार था, लेकिन इन दिनों उसे पैसों की सख्त ज़रूरत थी।

जब पूरे राज्य में राजा की इस अजीब चुनौती और मुँह-मांगे इनाम की चर्चा शुरू हुई, तो यह बात केशव के कानों तक भी पहुँची। इनाम की बात सुनते ही वह बिना समय बर्बाद किए सीधा राजदरबार पहुँच गया।

केशव ने दरबार में जाकर हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! मैं आपका पूरा महल, और यहाँ तक कि पूरा राज्य सिर्फ इसी एक मटकी रंग से हरा कर सकता हूँ। बस मुझे एक रात का समय दीजिए।"

दरबारी केशव की बात पर हैरान रह गए। सेनापति ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा, "केशव, जब राज्य का सबसे बड़ा चित्रकार और कई बड़े बुद्धिमान लोग हार गए और जेल में चक्की पीस रहे हैं, तो तुम क्या यह कर पाओगे?" लेकिन केशव के चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी।

राजा ने उसे वह मटकी दे दी और कहा, "ठीक है, कल सुबह मैं हरा महल देखूंगा।" केशव ने उस रंग की मटकी से महल की एक भी दीवार को हाथ नहीं लगाया।

वह सीधा बाज़ार गया और कांच बनाने वाले एक कारीगर के पास पहुँचा।

केशव ने उस 'एक मटकी हरे रंग' में कांच के दो छोटे और गोल टुकड़े डुबो दिए, जिससे वो कांच पूरी तरह से 'हरे' हो गए। फिर उसने उन हरे कांच के टुकड़ों को एक सुंदर से चश्मे के फ्रेम में फिट कर दिया, और वह आराम से घर जाकर सो गया।

सुबह-सुबह महाराज विक्रम सिंह अपने छज्जे पर आए। उन्होंने देखा कि महल तो अभी भी सफेद ही है। राजा आगबबूला हो गए, "कहाँ है वो मज़दूर? उसे पकड़ कर लाओ, उसने मेरा समय बर्बाद किया है!"

तभी केशव मुस्कुराता हुआ दरबार में हाज़िर हुआ। उसके हाथ में मखमल की छोटी सी डिब्बी थी। राजा ने गुस्से से कहा, "तुमने महल को हरा क्यों नहीं किया? अब तुम भी जेल जाओगे!"

केशव ने बहुत शांति से डिब्बी खोली और वह 'हरे कांच वाला चश्मा' महाराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "महाराज! ज़रा इस जादुई ऐनक को अपनी आँखों पर पहन कर तो देखिए। मैंने अपना काम पूरा कर दिया है।"

महाराज ने वह चश्मा पहना और जैसे ही उन्होंने नज़र घुमाई... वे हैरान रह गए! चश्मे के हरे कांच की वजह से उन्हें महल की सफेद दीवारें हरी दिखने लगीं। संगमरमर का फर्श, सारे मंत्री और आसमान भी हरा नज़र आ रहा था!

महाराज विक्रम सिंह चश्मा उतारकर ज़ोर से हँस पड़े और बोले, "वाह केशव! तुम वाकई बहुत चतुर और बुद्धिमान हो! तुमने सिर्फ महल को ही नहीं रंगा है, तुमने तो मेरी आँखें भी रंग दीं!"

केशव ने सिर झुकाकर बहुत ही विनम्रता से जवाब दिया: "महाराज! आपकी शर्त थी कि आपको सब कुछ हरा नज़र आना चाहिए, और रंग सिर्फ एक मटकी इस्तेमाल होना चाहिए।"

"महाराज, अगर हम पूरी दुनिया को बदलने निकलेंगे, तो रंग का समंदर भी कम पड़ जाएगा। इसलिए मैंने दुनिया को रंगने के बजाय, आपके देखने का 'नज़रिया' ही रंग दिया!"

यह हाज़िरजवाबी सुनकर पूरा दरबार तालियों से गूँज उठा। महाराज विक्रम सिंह केशव की इस अक्लमंदी से इतने खुश हुए कि उन्होंने केशव को मुँह-मांगा इनाम देकर अपने दरबार का 'मुख्य सलाहकार' बना लिया। केशव की सारी परेशानियां दूर हो गईं और वह खुशी-खुशी रहने लगा।

🎉 कहानी समाप्त

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