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सच्ची कीमत

अमन खंडेलवाल5 मिनट का पठन
सच्ची कीमत

चंदनपुर नाम के एक कस्बे में 'आर्यन' नाम का एक बहुत ही होनहार और मेहनती लड़का रहता था। आर्यन के हाथों में जादू था, वह लकड़ी की बहुत ही सुंदर और बारीक नक्काशी करता था। लेकिन, कस्बे के लोग उसकी कला की कोई कद्र नहीं करते थे।

जब भी वह अपनी बनाई कोई सुंदर चीज़ बाज़ार में बेचने जाता, तो लोग मोलभाव करके उसे कौड़ियों के भाव मांगते। लगातार अपनी कला और मेहनत का ऐसा अपमान देखकर आर्यन बहुत हताश हो गया। एक दिन वह मुँह लटकाए घर के आँगन में बैठा था।

उसके पिता 'दीनानाथ' जी बहुत ही समझदार और सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और पूछा, "क्या बात है बेटा? इतने उदास क्यों हो?"

आर्यन ने कहा, "पिताजी, मुझे लगता है कि मुझमें कोई हुनर नहीं है। मेरी कला की कोई कीमत नहीं है।"

"मैं इतनी मेहनत से चीज़ें बनाता हूँ, लेकिन लोग कहते हैं कि यह किसी काम की नहीं हैं। शायद मैं ही किसी लायक नहीं हूँ।"

दीनानाथ जी ने आर्यन की बात शांति से सुनी। वे समझ गए कि उनका बेटा गहरी दुविधा और निराशा में है। वे मुस्कुराए और अपने कमरे में गए।

थोड़ी देर बाद वे बाहर आए, तो उनके हाथ में एक अजीब सा, खुरदरा और बिल्कुल साधारण सा दिखने वाला पत्थर था। उन्होंने वह पत्थर आर्यन के हाथ में रखा और कहा, "बेटा, मेरा एक काम करो।"

"इस पत्थर को सुरक्षित अपनी जेब में रखकर बाज़ार जाओ और लोगों से इसकी कीमत पता करो। लेकिन मेरी एक शर्त है - चाहे कोई तुम्हें कितने भी पैसे दे, तुम्हें यह पत्थर बेचना नहीं है। बस कीमत पूछकर सीधे घर वापस आ जाना।"

आर्यन थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन पिता की बात मानकर पत्थर लेकर घर से निकल पड़ा।

सबसे पहले वह सड़क किनारे बैठे एक कबाड़ी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाते हुए पूछा, "काका, क्या आप बता सकते हैं कि इस पत्थर की कीमत क्या होगी?"

कबाड़ी वाले ने पत्थर को उलट-पलट कर देखा और बोला, "यह तो कोई आम चमकीला पत्थर है। इसे मैं अपने उड़ते हुए कागज़ों को दबाने के काम में ले लूँगा। मैं तुम्हें इसके 10 रुपये दे सकता हूँ।"

आर्यन ने पत्थर वापस लिया और आगे बढ़ गया। फिर वह बाज़ार के एक बड़े दुकानदार के पास गया, जो कपड़े और सजावट का सामान बेचता था। आर्यन ने उसे पत्थर दिखाया।

दुकानदार को वह पत्थर थोड़ा आकर्षक लगा। उसने कहा, "पत्थर दिखने में थोड़ा अलग है। इसे मैं अपनी दुकान के शोकेस में सजावट के लिए रख लूँगा। मैं इसके तुम्हें 100 रुपये दे सकता हूँ।"

आर्यन ने पिता की शर्त याद रखी और पत्थर लेकर वहाँ से भी चल दिया।

अंत में, आर्यन शहर के सबसे बड़े और मशहूर जौहरी की दुकान पर पहुँचा। उसने वह पत्थर जौहरी के सामने मेज़ पर रख दिया। जौहरी ने जैसे ही उस पत्थर को देखा, वह एकदम चौंक गया।

उसने तुरंत अपना खास चश्मा पहना और एक छोटी सी मशीन से उस पत्थर की गहराई से जाँच की। थोड़ी देर बाद जौहरी ने अचरज से आर्यन की तरफ देखा और पूछा, "बेटा! यह तुम्हें कहाँ से मिला?"

आर्यन ने थोड़ी झिझक के साथ कहा, "जी, यह मेरे पिताजी का है। मैं बस यह जानना चाहता था कि अगर हम इसे बाज़ार में बेचें, तो इसकी क्या कीमत मिल सकती है।"

जौहरी ने एक गहरी साँस ली और कहा, "बेटा, दिखने में यह भले ही साधारण लगे, लेकिन यह कोई मामूली पत्थर नहीं है। यह एक असली कच्चा हीरा है! आम लोगों को इसकी पहचान नहीं होती।"

"अगर तुम इसे मुझे बेचना चाहो, तो मैं अभी के अभी तुम्हें इसके पूरे एक लाख रुपये नकद दे सकता हूँ!" आर्यन यह सुनकर सन्न रह गया।

उसने जौहरी से माफी मांगी और कहा कि वह इसे बेच नहीं सकता। वह तुरंत पत्थर को अपनी जेब में सुरक्षित रखकर दौड़ता हुआ अपने पिताजी के पास वापस आ गया।

उसने हाँफते हुए पिताजी को सारी बात बताई - "पिताजी! कबाड़ी वाले ने 10 रुपये कहे, दुकानदार ने 100 रुपये, लेकिन जौहरी ने कहा कि यह एक असली हीरा है और वह इसके एक लाख रुपये देने को तैयार था!"

दीनानाथ जी मुस्कुराए और आर्यन के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "बेटा, क्या अब तुम्हें बात समझ में आई? कबाड़ी वाले ने अपनी समझ और ज़रूरत के हिसाब से इसे 10 रुपये का माना, दुकानदार ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से इसे 100 रुपये का माना।"

"लेकिन एक जौहरी ही पत्थरों का असली पारखी होता है, इसलिए उसने इसकी सच्ची कीमत पहचान ली।"

पिताजी ने आर्यन की आँखों में देखते हुए आगे कहा, "बेटा, तुम भी इस कच्चे हीरे की तरह ही हो! तुम्हारी कला और तुम्हारा हुनर भी कीमती है। बस फर्क इतना है कि तुम अब तक अपनी कला की कीमत उन लोगों से पूछ रहे थे जिन्हें तुम्हारी कला की कोई समझ नहीं है।"

"जब वे लोग तुम्हारी कला की कीमत तय करते हैं, तो तुम खुद को कमज़ोर समझने लगते हो।" आर्यन की आँखों में चमक आ गई थी, उसकी सारी निराशा दूर हो चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि उसे अपनी कला की कद्र करने वाले सही लोगों तक पहुँचना है।

🎉 कहानी समाप्त

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