सबसे जरूरी कौन?

एक बार की बात है, सुवर्णपुर राज्य में एक राजा था। राजा ताकतवर था, दयालु भी था और समझदार भी था। प्रजा उससे खुश थी, लेकिन उसकी एक अजीब आदत थी—उसके मन में कोई विचित्र खयाल आता और वह तुरंत आदेश दे देता।
राजा की हर बात मानी जाती थी, क्योंकि वह बहुत ताकतवर था। मगर राज्य के लोग उसकी सनकी आदत से परेशान रहते थे। डर के मारे कोई उसे कुछ कह नहीं पाता था।
एक बार राजा को खयाल आया कि नीले रंग में बहुत शक्ति है। तुरंत आदेश हो गया, "राज्य में सारे घर नीले रंग के होने चाहिए!" बेचारों को लाल ईंटों, पीली मिट्टी और सफेद चूने वाले घर तक नीले रंगने पड़े।
पूरा राज्य एक जैसा दिखने लगा और लोग मन ही मन परेशान रहे। दूसरी बार राजा को लगा कि राज्य में बहुत शोर है। उसने आदेश दिया, "आज से कोई भी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करेगा, सब फुसफुसाकर बात करेंगे!"
बाजार में दुकानदार फुसफुसाने लगे, स्कूल में बच्चे चुपचाप पढ़ने लगे और मंदिरों की घंटियाँ बंद हो गईं। पूरा राज्य सन्नाटे में डूब गया। कुछ दिनों बाद राजा का मन बदला और सब पहले जैसा हो गया।
तीसरी बार राजा ने सोचा कि सब लोग एक जैसे कपड़े पहनेंगे तो एकता आएगी। उसने आदेश दिया, "आज से सबको लाल रंग के धोती-कुर्ते ही पहनने होंगे!" बुनकर भागदौड़ में लग गए और रंगरेज थक गए।
राज्य में रंगों की विविधता ही खत्म हो गई और हर कोई एक जैसा दिखने लगा। लोग परेशान थे, पर डर के मारे बोलते नहीं थे। एक दिन राजा बाग में टहल रहा था कि उसके मन में सवाल उठा, "मेरे राज्य का सबसे जरूरी आदमी कौन है?"
यह खयाल आते ही उसने दरबार बुलाया और इनाम घोषित कर दिया—जो बताएगा कि सबसे जरूरी आदमी कौन है, उसे सौ स्वर्ण मोहरें मिलेंगी। अगले दिन दरबार भरा था और राजा ने सब से पूछा, "सबसे जरूरी आदमी कौन है?" जवाबों की होड़ लग गई।
दरबारी बोला, "महाराज, आप ही सबसे जरूरी हैं!" सौदागर, जमींदार, मंत्री और सेनापति—सब अपने-आप को ही सबसे जरूरी बताने लगे। राजा निराश हुआ और बोला कि मुझे सोचने का समय चाहिए, दरबार खत्म।
दिन बीत गए, पर राजा की उलझन नहीं सुलझी। एक दिन वह अकेला जंगल की ओर निकला और पीपल के पेड़ के नीचे एक साधु से मिला। साधु ने राजा की परेशानी सुनकर कहा कि जवाब तुम खुद ढूंढ सकते हो।
साधु ने सलाह दी कि एक दिन के लिए अपने काम मंत्रियों को सौंप दो, साधारण कपड़े पहनो और राज्य में घूमो। उन लोगों से मिलो जिनसे कभी बात नहीं की, उनका काम देखो और उनसे पूछो। राजा ने बात मान ली और भेष बदलकर निकल पड़ा।
पहले वह एक गाँव पहुँचा, जहाँ किसान खेत में हल चला रहा था। राजा ने पूछा कि सुबह से काम कर रहे हो तो किसान बोला कि फसल बोनी है, पानी देना है और निराई भी करनी है। किसान हँसकर बोला कि अगर हम अनाज नहीं उगाएँगे तो राजा, सैनिक और पूरा राज्य भूखा रह जाएगा।
फिर राजा शहर में लोहार की दुकान पर गया और भट्टी की गर्मी में उसकी मेहनत देखकर हैरान रह गया। लोहार ने बताया कि वह सैनिकों के लिए तलवारें बनाता है और किसान के लिए दरांती भी। उसने गर्व से कहा कि मजबूत हथियार और औजार न हों तो सब अधूरा है।
इसके बाद राजा एक वैद्य के पास बैठा, जहाँ सुबह से शाम तक मरीजों की भीड़ लगी थी। वैद्य दवा बनाता रहा और हर किसी से प्यार से बात करता रहा। शाम को एक गंभीर मरीज ठीक हुआ तो राजा की आँखें खुल गईं।
शाम होते-होते राजा वापस उसी पीपल के पेड़ के पास पहुँचा और साधु से बोला कि जवाब मिल गया। राजा ने कहा कि सबसे जरूरी कोई एक नहीं—किसान, लोहार, वैद्य, बुनकर—सबका काम एक-दूसरे से जुड़ा है। उसने यह भी माना कि दरबार में लोग डर के मारे झूठ बोल रहे थे।
राजा ने फिर से दरबार बुलाया और फिर पूछा, "सबसे जरूरी आदमी कौन है?" वही पुराने जवाब आने लगे, तो राजा की आवाज गूंजी कि तुम सब झूठ बोल रहे हो, क्योंकि तुम मुझसे डरते हो। फिर वह रुका और मुस्कुराकर बोला कि मैं सबको माफ करता हूँ।
राजा ने कहा कि सबसे जरूरी कोई एक आदमी नहीं है, सबसे जरूरी हैं हम सब। जैसे शरीर में हर अंग जरूरी है, वैसे ही राज्य में हर व्यक्ति जरूरी है। उसने स्वीकार किया कि राजा होना सबसे जरूरी होना नहीं है, और आज से कोई भी फैसला बिना सोचे-समझे नहीं लेगा।
दरबार में तालियाँ गूंज उठीं और उस दिन के बाद राजा बदल गया। अब वह सनकी नहीं रहा, वह सबका सम्मान करता था। धीरे-धीरे राज्य में सच्ची खुशहाली आ गई।
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