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कंजूस की शादी

लोक परंपरा7 मिनट का पठन
कंजूस की शादी

काठियावाड़ के एक गाँव में सेठ भोगीलाल रहते थे — इलाक़े भर में उनकी कंजूसी के क़िस्से मशहूर थे। कहते हैं एक बार उन्होंने अपने ही बेटे के जन्मदिन पर पड़ोसी के घर की मोमबत्ती उधार माँग ली थी, "थोड़ी देर के लिए फूँक मारकर बुझा देंगे, ज़्यादा नहीं जलाएँगे" कहकर। तो जब ऐसे सेठ भोगीलाल की अपनी शादी की बारी आई, तो पूरे गाँव में यह चर्चा का विषय बन गया कि आख़िर इस बार यह कैसे अपनी कंजूसी निभाएँगे।

शादी की तारीख़ तय हुई, तो सबसे पहले भोगीलाल ने निमंत्रण-पत्र छपवाने से ही बचने की तरकीब निकाली। उन्होंने सोचा, "छपे हुए कार्ड पर तो अच्छा-ख़ासा ख़र्च आएगा।" तो उन्होंने पुराने अख़बारों के हाशिये काटकर उन पर हाथ से शादी की तारीख़ और जगह लिख दी, और वही "निमंत्रण-पत्र" रिश्तेदारों को बाँट दिए। कुछ रिश्तेदारों ने तो पहले उसे रद्दी समझकर फेंक ही दिया, बाद में पता चला कि वही शादी का कार्ड था!

बारात के खाने का इंतज़ाम सबसे बड़ी चुनौती थी। भोगीलाल ने हलवाई से मोलभाव करते हुए एक अनोखी शर्त रखी — "मिठाई बनाओ ज़रूर, पर आकार में थोड़े छोटे लड्डू बनाना, ताकि एक किलो में साठ के बजाय सौ लड्डू निकलें।" हलवाई हैरान रह गया, पर पैसे के लालच में मान गया। नतीजा यह हुआ कि बारात में परोसे गए लड्डू इतने छोटे थे कि मेहमान उन्हें चने समझकर मुँह में डाल लेते और चबाते ही रह जाते।

खाने में सब्ज़ी की मात्रा बचाने के लिए भोगीलाल ने एक और तरकीब निकाली — उन्होंने रसोइए से कहा, "सब्ज़ी में पानी थोड़ा ज़्यादा डाल देना, इससे शोरबा बढ़िया बनेगा और लोग रोटी ज़्यादा डुबो-डुबोकर खाएँगे, तो सब्ज़ी कम में ही काम चल जाएगा।" पहली ही थाली परोसते वक़्त मेहमानों को समझ नहीं आया कि यह सब्ज़ी है या पतली दाल — कुछ लोग तो चम्मच माँगने लगे।

बारात के लिए बैंड-बाजे का भी बड़ा ख़र्च था, तो भोगीलाल ने एक ही बैंड वाले को बुलाया, वह भी सिर्फ़ ढोलक बजाने के लिए — बाक़ी वाद्य-यंत्रों की आवाज़ निकालने के लिए उन्होंने अपने भतीजों को सिखा दिया कि मुँह से "पों-पों" और "तुर्र-तुर्र" की आवाज़ें निकालें। नतीजा यह हुआ कि बारात जब गाँव की गलियों से निकली, तो एक तरफ़ असली ढोलक बज रही थी, और दूसरी तरफ़ पंद्रह-बीस लड़के मुँह से बैंड की नक़ल करते हुए चल रहे थे — देखने वाले हँसते-हँसते दोहरे हुए जा रहे थे।

रोशनी का इंतज़ाम भी भोगीलाल ने अनोखे ढंग से किया। बिजली की लड़ियाँ किराए पर लेने के बजाय उन्होंने गाँव भर से लालटेनें उधार माँग लीं और बारात के रास्ते में जगह-जगह लटका दीं। पर लालटेनों में तेल भरने का ख़र्च बचाने के लिए उन्होंने आधी-अधूरी मात्रा में ही तेल डलवाया, जिससे आधे रास्ते में ही ज़्यादातर लालटेनें बुझ गईं और बाराती अंधेरे में एक-दूसरे से टकराते हुए आगे बढ़ते रहे।

सबसे बड़ा हंगामा तब हुआ जब दुल्हन पक्ष वालों ने बारात के स्वागत में शरबत परोसा। भोगीलाल ने पहले ही अपने आदमियों को हिदायत दे रखी थी — "ज़्यादा मत पीना, शरबत महँगा होता है, दूसरे के घर का है तो क्या, फिर भी संयम बरतना।" पर जब उनके ही एक बाराती ने तीसरा गिलास माँगा, तो भोगीलाल ख़ुद बीच में कूद पड़े और बोले — "अरे भाई, इतना शरबत पीओगे तो पेट ख़राब हो जाएगा, बस करो!"

यह सुनकर दुल्हन के पिता हैरान रह गए — "अरे सेठ जी, यह तो हमारे यहाँ का शरबत है, हमने ही पिलाया है, आप क्यों रोक रहे हैं?" पूरी बारात में ज़ोर का ठहाका गूँज उठा, और भोगीलाल शर्मिंदा होकर चुप हो गए, क्योंकि कंजूसी उनकी आदत में इतनी रच-बस गई थी कि दूसरे के घर का ख़र्च बचाने की भी उन्हें फ़िक्र होने लगी थी।

आख़िर में जब फेरों का समय आया, पंडित जी ने दक्षिणा माँगी। भोगीलाल ने जेब से एक पुराना, फटा हुआ नोट निकालकर दिया। पंडित जी ने नोट देखकर मुँह बनाया — "सेठ जी, यह नोट तो आधा फटा है, चलेगा नहीं।" भोगीलाल तुरंत बोले — "अरे पंडित जी, आधा फटा है तो क्या, आधी दक्षिणा तो पूरी बनती है ना! बाक़ी आधा मैं टेप से चिपकाकर बाद में दे दूँगा!"

यह सुनकर पूरा मंडप हँसी से गूँज उठा। ख़ुद दुल्हन, जो अब तक घूँघट में शर्माते हुए चुप बैठी थी, हँसी रोक नहीं पाई और खिलखिला पड़ी। भोगीलाल की माँ ने सिर पीटते हुए कहा — "बेटा, आज तेरी शादी है, कम-से-कम आज तो हाथ खोल दे!"

अंततः भीगी बिल्ली बनकर भोगीलाल ने जेब से एक पूरा नोट निकालकर पंडित जी को दिया, पर मुँह ही मुँह में बड़बड़ाते रहे — "इतना बड़ा नोट... एक ही दिन में..."

शादी की यह कहानी काठियावाड़ में सालों तक क़िस्से-कहानियों में सुनाई जाती रही, और जब भी कोई बहुत ज़्यादा कंजूसी करता, गाँव वाले हँसते हुए कहते — "अरे भाई, तू तो भोगीलाल सेठ की शादी वाला फटा नोट बनने से बचना!"

🎉 कहानी समाप्त

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