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नए घर का वास्तु

लोक परंपरा7 मिनट का पठन
नए घर का वास्तु

शर्मा जी ने बरसों की मेहनत के बाद आख़िरकार अपना नया घर बनवाया था। घर बनकर तैयार हुआ, तभी शर्मा जी की पत्नी सुनीता जी को पड़ोस की मिसेज़ अग्रवाल ने एक "बहुत बड़े" वास्तु विशेषज्ञ पंडित शुभंकर जी का नंबर दे दिया। "बिना वास्तु ठीक किए घर में मत घुसना," मिसेज़ अग्रवाल ने चेतावनी दी, "वरना घर में बरकत नहीं आएगी!"

सुनीता जी को यह बात दिल में बैठ गई। उसी शाम पंडित शुभंकर जी घर आए। हाथ में एक कम्पास (दिशा-सूचक यंत्र) और एक मोटी किताब लिए हुए, वे पूरे घर में घूमने लगे — कभी दीवार पर हाथ फेरते, कभी छत की तरफ़ देखते, कभी कुछ बुदबुदाते।

आधे घंटे बाद उन्होंने अपना फ़ैसला सुनाया — "यह घर तो बिल्कुल उल्टा बना है! रसोईघर आग्नेय कोण में नहीं, बल्कि पश्चिम में है — यह घोर अशुभ है। पूजा घर वायव्य कोण में है, जबकि इसे ईशान कोण में होना चाहिए। और यह जो मुख्य दरवाज़ा है — यह तो सीधा दक्षिण दिशा में खुल रहा है, जो कि सबसे बुरा माना जाता है!"

शर्मा जी घबरा गए — "पंडित जी, अब क्या करें? घर तो बन चुका है, तोड़ तो नहीं सकते।"

पंडित जी मुस्कुराए — "तोड़ने की ज़रूरत नहीं। हम सामान की व्यवस्था से ही वास्तु-दोष ठीक कर देंगे। बस मेरी हर बात माननी होगी।"

अगले दिन से घर में उलटफेर शुरू हो गया। सबसे पहले फ़रमान आया कि घर का मुख्य दरवाज़ा तो बदला नहीं जा सकता, इसलिए उसके ठीक सामने एक बड़ा-सा शीशा टांग दिया जाए ताकि "नकारात्मक ऊर्जा" वापस लौट जाए। शर्मा जी के बेटे राहुल ने जब पहली बार रात को दरवाज़ा खोला और सामने अचानक अपना ही भूतिया प्रतिबिंब देखा, तो डर के मारे उसकी चीख निकल गई और हाथ से मोबाइल छूटकर टूट गया।

फिर आदेश आया कि सोफ़ा सेट अभी जिस दीवार से सटा है, वहाँ से हटाकर ठीक कमरे के बीचोंबीच रखा जाए, क्योंकि "ब्रह्मस्थान" यानी घर का केंद्र हमेशा खाली रहना चाहिए, इसलिए भारी सामान किनारों पर ही होना चाहिए। सुनीता जी ने पूरे परिवार को बुलाकर घंटों मशक्कत से सोफ़ा घसीटा, पर नतीजा यह निकला कि अब कमरे में घुसते ही सीधे सोफ़े के पिछले हिस्से से टकराना पड़ता।

अगला नंबर आया डाइनिंग टेबल का। पंडित जी बोले, "खाना हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खाना चाहिए, इसलिए टेबल को तिरछा घुमा दीजिए।" टेबल तिरछी हुई, तो एक कोना ठीक रसोई के दरवाज़े के सामने आ गया — अब सुनीता जी जब भी खाना लेकर रसोई से बाहर निकलतीं, उनकी जांघ टेबल के कोने से टकरा जाती। हफ़्ते भर में उनकी जांघ पर तीन नीले निशान पड़ चुके थे।

इसके बाद बारी आई पौधों की। "तुलसी का पौधा उत्तर-पूर्व में होना चाहिए, और कैक्टस घर के अंदर बिल्कुल नहीं रखना चाहिए," पंडित जी ने फ़रमाया। शर्मा जी के ससुर, जो अपने कैक्टस के शौक़ीन थे, उनके गमले बालकनी में इस तरह क़तार से रख दिए गए कि अब बालकनी में चलने के लिए साँप की तरह टेढ़ा-मेढ़ा चलना पड़ता था। एक दिन रात को बाथरूम जाते वक़्त ससुर जी खुद ही अपने कैक्टस के गमले से टकरा गए और सुबह तक "आउच-आउच" करते रहे।

सीढ़ियों के नीचे की जगह, जहाँ पहले जूते-चप्पल रखे जाते थे, वहाँ अब "जल तत्व" बढ़ाने के लिए एक छोटा फ़व्वारा लगाने का आदेश आया। फ़व्वारा तो लग गया, पर अब जूते रखने की कोई जगह नहीं बची, तो पूरे परिवार के जूते-चप्पल दरवाज़े के ठीक बीचोंबीच के रास्ते में इकट्ठे होने लगे। हर आने-जाने वाला किसी-न-किसी जूते पर पैर रखकर लड़खड़ाता।

दो हफ़्ते बाद हालत यह हो गई कि घर के अंदर चलना किसी बाधा-दौड़ (ऑब्स्टेकल रेस) से कम नहीं था — दरवाज़े पर शीशे से बचो, बीच कमरे में सोफ़े से टकराओ मत, डाइनिंग टेबल के कोने से जांघ बचाओ, बालकनी में कैक्टस से दूर रहो, और सीढ़ियों के पास फ़व्वारे और जूतों के ढेर के बीच से रास्ता निकालो।

एक शाम घर में मेहमान आए — शर्मा जी के पुराने दोस्त वर्मा जी अपने पूरे परिवार के साथ। दरवाज़े से घुसते ही वर्मा जी की पत्नी शीशे में अपना ही चेहरा देखकर चौंक पड़ीं, फिर बीच रास्ते में सोफ़े से टकराईं, वर्मा जी का बेटा फ़व्वारे के पानी के छींटों से भीग गया, और खुद वर्मा जी जूतों के ढेर पर पैर रखकर लगभग गिरते-गिरते बचे।

वर्मा जी ने हँसते हुए पूछा — "भाई शर्मा, यह घर है या बाधा-दौड़ का मैदान? बरकत की जगह तो लगता है तुमने चोट-पट्टी का इंतज़ाम कर लिया!"

पूरा शर्मा परिवार एक-दूसरे का मुँह ताकने लगा। तभी सबसे छोटी बेटी, जो अब तक चुपचाप यह सब देख रही थी, बोल पड़ी — "पापा, पहले तो हम आराम से घर में घूमते थे, अब तो हर कदम पर डर लगता है कि कहीं किसी चीज़ से टकरा न जाएँ। यह कैसा वास्तु है जो चलने की जगह ही खा गया?"

शर्मा जी को एक पल के लिए एहसास हुआ कि बेटी की बात में दम है। उन्होंने सुनीता जी की तरफ़ देखा, सुनीता जी ने ससुर जी की तरफ़, और ससुर जी ने अपनी चोटिल टांग सहलाते हुए कहा — "बेटा, अब बहुत हो गया वास्तु-वास्तु। कल ही सामान वापस उसकी असली जगह पर रखवा दो। कम-से-कम चलने की जगह तो वापस मिल जाए, बरकत बाद में देख लेंगे!"

अगले दिन पूरा घर वापस अपनी पुरानी जगह पर सजा दिया गया — सोफ़ा दीवार से सटा, टेबल सीधी, जूते जूता-स्टैंड में, और फ़व्वारे की जगह वापस चप्पलें। घर में फिर से आराम से चलना मुमकिन हुआ, और शर्मा परिवार ने तय किया कि असली "बरकत" शायद इसी में है कि घर में बिना किसी चीज़ से टकराए चैन से घूमा जा सके।

🎉 कहानी समाप्त

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