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👑 अकबर-बीरबल

आधा इनाम — लालची दरबान और बीरबल की बिना कोड़ा खाए सज़ा

लोक परंपरा — अकबर-बीरबल5 मिनट का पठन
आधा इनाम — लालची दरबान और बीरबल की बिना कोड़ा खाए सज़ा

मुग़ल सल्तनत की राजधानी आगरा में कला और साहित्य का बहुत सम्मान होता था। एक बार शहंशाह अकबर ने पूरे हिंदुस्तान के कवियों और विद्वानों के लिए एक 'शाही मुशायरे' का आयोजन किया। घोषणा की गई कि जो भी कवि शहंशाह को अपनी कविता से सबसे अधिक प्रसन्न करेगा, उसे मुँहमांगा इनाम दिया जाएगा।

बीरबल, जो आगरा के प्रशासन और शाही कर्मचारियों की ईमानदारी परखना चाहते थे, उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाने का विचार किया। मुशायरे वाले दिन, बीरबल ने अपने शाही रेशमी वस्त्र उतार कर एक अत्यंत साधारण और फटे-पुराने कपड़े पहनने वाले एक गरीब देहाती कवि का भेष धारण कर लिया। उन्होंने चेहरे पर थोड़ी कालिख मल ली और बड़ी सी पगड़ी बांध ली ताकि कोई उन्हें पहचान न सके।

लालची दरबान का फंदा: भेष बदलकर बीरबल आगरा के किले के मुख्य द्वार पर पहुँचे। किले का मुख्य दरबान 'शेर सिंह' बहुत ही लालची और भ्रष्ट इंसान था। उसने बीरबल को एक फटेहाल देहाती समझकर रोक लिया।

शेर सिंह ने कड़कती आवाज़ में कहा, "ऐ फकीर! कहाँ मुँह उठाए जा रहा है? यह शहंशाह का दरबार है, कोई खैरातखाना नहीं। चल भाग यहाँ से!"

बीरबल ने अत्यंत दीनता से हाथ जोड़कर कहा, "हुज़ूर! मैं बहुत दूर से आया हूँ। मैंने शहंशाह की शान में एक बहुत ही नायाब कविता लिखी है। यदि मैं उन्हें सुनाऊँगा, तो वे मुझे भारी इनाम देंगे। कृपया मुझे अंदर जाने दें।"

'भारी इनाम' का नाम सुनते ही दरबान शेर सिंह की आंखों में लालच चमक उठा। उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "अंदर तो मैं तुझे जाने दूँगा, पर मेरी एक शर्त है। शहंशाह तुझे जो भी इनाम देंगे, उसका ठीक आधा (50%) हिस्सा तुझे मुझे देना होगा। यदि मंज़ूर है, तो जा!"

बीरबल ने बेबसी का नाटक करते हुए कहा, "ठीक है हुज़ूर! मुझे आपकी शर्त मंज़ूर है।"

दीवान-ए-खास का मुशायरा: बीरबल दरबार में दाखिल हुए। वहां एक से बढ़कर एक कवि अपनी रचनाएं सुना रहे थे। जब उस गरीब देहाती कवि (बीरबल) की बारी आई, तो उन्होंने अकबर की शान और मुग़ल सल्तनत की न्यायप्रियता पर एक ऐसी ओजस्वी और शानदार कविता पढ़ी कि पूरा दीवान-ए-खास तालियों से गूंज उठा।

अकबर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने सिंहासन से आगे झुककर कहा, "वाह! तुम्हारी कविता ने हमारा दिल जीत लिया। मांगो ऐ कवि, आज तुम जो मांगोगे, मुग़ल सल्तनत तुम्हें वही देगी। सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात... बोलो, क्या चाहिए?"

100 कोड़ों की अजीब मांग और बीरबल का दांव: पूरा दरबार सांस रोके सुन रहा था कि यह गरीब आदमी क्या मांगेगा। बीरबल ने हाथ जोड़कर, अत्यंत गंभीर स्वर में कहा: "जहाँपनाह! आपकी महानता की जय हो। मुझे न सोना चाहिए और न चांदी। मेरी कविता का इनाम यह है कि मुझे ठीक 100 कोड़े मारे जाएं!"

यह सुनकर पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने कहा, "क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? हम तुम्हारी कविता से खुश हैं, कोई सज़ा नहीं दे रहे। इनाम मांगो!"

परंतु बीरबल अपनी ज़िद पर अड़े रहे— "नहीं हुज़ूर! मेरा मुँहमांगा इनाम 100 कोड़े ही हैं। परंतु जहाँपनाह, मेरी एक विनती है!"

अकबर ने उलझन में पूछा, "कैसी विनती?"

बीरबल ने मुस्कुराते हुए अपनी असली चाल चली: "जहाँपनाह! मैं उसूलों का पक्का हूँ। किले के मुख्य दरबान शेर सिंह ने मुझे अंदर आने देने के बदले मुझसे वादा लिया था कि मुझे जो भी इनाम मिलेगा, उसका आधा (50%) हिस्सा मैं उसे दूँगा। मैं अपना वचन नहीं तोड़ना चाहता। इसलिए हुज़ूर, मेरी विनती है कि मेरे इनाम के पहले 50 कोड़े मेरे उस 'हिस्सेदार' दरबान को दिए जाएं, ताकि मैं अपना कर्ज़ चुका सकूँ!"

सच्चाई का पर्दाफाश और शहंशाह का न्याय: यह सुनते ही अकबर को पूरी बात समझ आ गई। दरबार में सन्नाटा टूट गया और लोग इस अनाम कवि की बुद्धिमत्ता पर हैरान रह गए। अकबर का चेहरा क्रोध से लाल हो गया कि उनके ही महल के बाहर ऐसा भ्रष्टाचार चल रहा है।

अकबर ने तुरंत सिपाहियों को भेजकर दरबान शेर सिंह को दरबार में घसीट मंगवाया। दरबान खुश होते हुए आया कि शायद कवि को अशरफियां मिली हैं।

अकबर ने गरजते हुए जल्लाद से कहा, "जल्लाद! इस दरबान को इसके हिस्से का आधा इनाम दिया जाए! इसे 50 कोड़े मारो!"

इनाम में कोड़े मिलने की बात सुनकर शेर सिंह के होश उड़ गए। वह रोता-गिड़गिड़ाता रहा, परंतु उसे दरबार के बीचों-बीच 50 कोड़े मारे गए। सज़ा पूरी होने के बाद वह ज़मीन पर पड़ा कराह रहा था।

अकबर ने उस कवि की ओर देखा और कहा, "अब तुम्हारे 50 कोड़ों की बारी है।"

तभी बीरबल ने अपने चेहरे की कालिख और पगड़ी उतार दी। बीरबल को अपने असली रूप में देखकर अकबर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

अकबर ने कहा, "वाह बीरबल वाह! मैं भी कहूँ कि इतनी हिम्मत और अक्ल इस सल्तनत में तुम्हारे अलावा और किसमें हो सकती है! तुमने बिना खुद को नुकसान पहुँचाए, मेरे ही महल में छिपे एक भ्रष्ट कर्मचारी का असली चेहरा दिखा दिया।" अकबर ने बीरबल के बाकी 50 कोड़ों की सज़ा तुरंत माफ़ कर दी और उनकी इस बुद्धिमत्ता और वफादारी के लिए उन्हें अशरफियों से भरा थाल असली इनाम के रूप में दिया। उस लालची दरबान को हमेशा के लिए महल से निकाल दिया गया।

🎉 कहानी समाप्त

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