लोमड़ी और खरगोश — चतुर दिमाग और जान की बाज़ी

एक भूखी लोमड़ी जंगल में शिकार की तलाश में घूम रही थी। अचानक झाड़ियों में उसे एक छोटा सा 'खरगोश' दिखाई दिया। लोमड़ी ने तुरंत छलांग लगाई और उस नन्हे खरगोश को अपने पंजों में दबोच लिया।
लोमड़ी ने अपने होंठ चाटते हुए कहा: "वाह! आज तो मुझे बिना ज़्यादा मेहनत किए ही नाश्ता मिल गया।"
खरगोश बहुत डर गया था, लेकिन वह जानता था कि अगर उसने हिम्मत हारी, तो लोमड़ी उसे खा जाएगी। उसने अपने दिमाग पर ज़ोर डाला और एक चालाकी सोची।
खरगोश का लालच का दांव: खरगोश ने बहुत ही शांत और मासूम आवाज़ में कहा: "लोमड़ी मौसी! मैं तो बहुत ही छोटा और कमज़ोर हूँ। मुझे खाकर आपके इतने बड़े पेट का एक कोना भी नहीं भरेगा। आप व्यर्थ में मुझे मारकर अपना स्वाद खराब करेंगी।"
लोमड़ी ने गुर्राकर कहा: "तो मैं क्या करूँ? भूखी रहूँ?"
खरगोश ने कहा: "नहीं मौसी! पास ही एक छोटी सी गुफा है, जहां मेरा पूरा परिवार रहता है। मेरे भाई-बहन बहुत 'मोटे-ताज़े और बड़े' हैं। अगर आप मुझे छोड़ दें, तो मैं आपको उस गुफा तक ले चलूँगा। आप उन सबको खाकर आराम से अपनी भूख मिटा सकती हैं।"
गुफा और आज़ादी: लोमड़ी लालच में आ गई। एक छोटे से खरगोश के बजाय उसे कई मोटे खरगोशों की दावत जो मिल रही थी! उसने खरगोश को थोड़ा ढील दी और कहा: "ठीक है, आगे-आगे चल।"
खरगोश उसे जंगल के किनारे एक चट्टान के पास ले गया। वहां एक बहुत ही 'संकरा सा बिल' था।
खरगोश ने कहा: "मौसी, वे सब इसी के अंदर हैं। मैं अंदर जाकर उन्हें बाहर लाता हूँ।"
जैसे ही लोमड़ी ने उसे छोड़ा, खरगोश बिजली की तेज़ी से उस बिल के अंदर घुस गया। लोमड़ी ने भी पीछे-पीछे अंदर घुसने की कोशिश की, लेकिन बिल इतना संकरा था कि लोमड़ी का सिर उसमें फंस गया!
अंदर जाकर खरगोश दूसरी तरफ के एक छोटे से रास्ते से निकलकर सुरक्षित जंगल में भाग गया। उधर लालची लोमड़ी बिल में फंसी हुई अपनी मूर्खता पर पछताती रही।
नीति / सीख: मुसीबत के समय घबराने के बजाय अक्ल (बुद्धि) का इस्तेमाल करना चाहिए। दूसरी तरफ, अत्यधिक लालच हमेशा नुकसानदायक होता है; लालच में इंसान अपने हाथ में आई चीज़ भी गँवा बैठता है।
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