शेर और भालू — आपसी झगड़ा और तीसरे का फायदा

गर्मियों के दिन थे। जंगल में शिकार बहुत मुश्किल से मिल रहा था। एक 'शेर' और एक 'भालू' दोनों ही बहुत भूखे थे और शिकार की तलाश में घूम रहे थे।
अचानक एक झाड़ी के पास दोनों को एक साथ एक 'हिरण का बच्चा' दिखाई दिया। दोनों ने एक ही समय पर उस पर झपट्टा मारा और उसे पकड़ लिया।
अब समस्या यह थी कि शिकार एक था और दावेदार दो।
शेर ने दहाड़ते हुए कहा: "इसे छोड़ दो! यह मेरा शिकार है। मैं जंगल का राजा हूँ, इसलिए इस पर पहला हक़ मेरा है।"
भालू भी पीछे हटने वाला नहीं था। उसने गुर्राते हुए कहा: "राजा होगे अपने घर के! मैंने इसे तुमसे पहले देखा था और मेरे पंजों ने इसे पहले पकड़ा है। इसे मैं खाऊंगा!"
अहंकार की भयंकर लड़ाई: दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। दोनों का अहंकार जाग उठा था।
बात इतनी बढ़ गई कि शिकार को वहीं छोड़कर शेर और भालू आपस में ही बुरी तरह लड़ने लगे। दोनों बहुत ताक़तवर थे। शेर अपने नुकीले पंजे मार रहा था, तो भालू अपनी भारी ताक़त से शेर को पटक रहा था।
लड़ाई कई घंटों तक चलती रही। लड़ते-लड़ते दोनों के शरीर से बहुत खून बह गया। अंततः दोनों बुरी तरह थक कर और लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़े। उनमें इतनी भी ताक़त नहीं बची थी कि वे एक इंच भी हिल सकें।
सियार की दावत: तभी वहां से एक चालाक 'सियार' गुज़रा। उसने देखा कि जंगल के दो सबसे ताक़तवर जानवर अधमरी हालत में ज़मीन पर पड़े हैं, और उनके बीच एक बहुत ही ताज़ा और स्वादिष्ट शिकार पड़ा है।
सियार समझ गया कि ये दोनों आपस में लड़कर अपनी ताक़त खत्म कर चुके हैं।
सियार बिना किसी डर के उनके पास आया। उसने मजे से उस शिकार को अपने दांतों में दबाया और शेर व भालू के ठीक सामने से उसे उठाकर अपनी गुफा की ओर ले गया।
शेर और भालू ज़मीन पर बेबस पड़े हुए सियार को अपना शिकार ले जाते हुए देखते रहे। वे दोनों एक-दूसरे से लड़कर इतने कमज़ोर हो गए थे कि सियार को रोक भी नहीं सके।
नीति / सीख: दो लोगों के आपसी झगड़े और अहंकार में हमेशा किसी 'तीसरे' का ही फायदा होता है। आपस में लड़ने के बजाय अगर वे चीज़ों को मिल-बांट कर (समझौता करके) इस्तेमाल करते, तो दोनों का फायदा होता।
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