लोमड़ी और मेंढक — झूठा वैद्य और अपनी बीमारी

एक दिन एक मेंढक अपने कीचड़ वाले तालाब से बाहर निकला। उसने जंगल के सभी जानवरों को इकट्ठा किया और एक ऊंचे पत्थर पर चढ़कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।
मेंढक ने घोषणा की: "सुनो! सुनो! जंगल के निवासियो! मैं दुनिया का सबसे महान और ज्ञानी 'वैद्य' हूँ। मेरे पास दुनिया की हर बीमारी का इलाज है। मैंने कई जड़ी-बूटियों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम में से जो भी बीमार है, वह मेरे पास आए, मैं उसे तुरंत ठीक कर दूँगा!"
भोले-भाले जानवर (खरगोश, हिरण आदि) मेंढक की इस बात से बहुत प्रभावित हुए। वे अपनी छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज करवाने के लिए मेंढक के पास लाइन में लगने लगे। मेंढक घमंड से फूल गया और बड़े-बड़े भाषण देने लगा।
चतुर लोमड़ी का सवाल: तभी वहाँ से एक चतुर लोमड़ी गुज़री। उसने मेंढक का यह नाटक देखा और उसकी बातें सुनीं।
लोमड़ी भीड़ को चीरती हुई आगे आई। उसने मेंढक को ऊपर से नीचे तक बहुत ध्यान से देखा। मेंढक की त्वचा कीचड़ के कारण बहुत भद्दी, खुरदरी और झुर्रियों से भरी थी। और वह चलते समय बुरी तरह लंगड़ा रहा था।
लोमड़ी ने ज़ोर से ठहाका लगाया और जानवरों से कहा: "अरे मूर्ख जानवरो! तुम सब इसकी बातों में कैसे आ गए?"
लोमड़ी ने मेंढक की तरफ मुड़कर व्यंग्य कसते हुए कहा: "अरे ओ महान वैद्य! तुम दूसरों की बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हो? ज़रा पहले खुद को तो शीशे में देखो! तुम्हारी अपनी त्वचा इतनी भद्दी और बीमारों जैसी है, और तुम लंगड़ा कर चलते हो। जो वैद्य पहले अपनी खुद की बीमारी और लंगड़ापन ठीक नहीं कर सकता, वह दूसरों का इलाज क्या खाक करेगा?"
लोमड़ी की यह बात सुनकर सारे जानवर समझ गए कि मेंढक केवल ढोंग कर रहा है। मेंढक शर्म के मारे तुरंत पत्थर से नीचे उतरा और छपाक से वापस अपने कीचड़ वाले तालाब में छिप गया।
नीति / सीख: दूसरों को ज्ञान या उपदेश देने से पहले इंसान को खुद पर अमल करना चाहिए।। जो व्यक्ति स्वयं की कमियों को दूर नहीं कर सकता, वह दूसरों का मार्गदर्शक कभी नहीं बन सकता।
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