मोर और कौवा — झूठा रूप और अपनों का तिरस्कार

एक जंगल में एक कौवा रहता था। वह अपने काले रंग और भद्दी आवाज़ से बहुत नफरत करता था। जब भी वह जंगल में मोरों को उनके सुंदर और रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाचते हुए देखता, तो उसे बहुत जलन होती थी।
कौवा सोचता: "काश! मैं भी इन मोरों की तरह सुंदर होता। यह काला रंग भी कोई रंग है!"
एक दिन उस कौवे को जंगल में मोरों के कुछ 'गिरे हुए पंख' मिल गए। कौवे के दिमाग में एक मूर्खतापूर्ण विचार आया। उसने उन सारे रंग-बिरंगे पंखों को इकट्ठा किया और उन्हें अपने शरीर और पूंछ में खोंस (चिपका) लिया।
मोर बनने का नाटक: पंख लगाकर कौवे को लगा कि वह सचमुच एक बहुत सुंदर मोर बन गया है। अहंकार में आकर उसने अपने बाकी 'कौवा दोस्तों' का मज़ाक उड़ाया और कहा: "मैं तुम जैसे बदसूरत और काले कौवों के साथ नहीं रहूँगा। मैं तो अब मोरों के साथ रहूँगा, क्योंकि मैं भी उन्हीं की तरह सुंदर हूँ।"
यह कहकर वह अकड़ता हुआ मोरों के झुंड में जा पहुँचा।
परंतु मोर तो बहुत समझदार पक्षी होते हैं। उन्होंने उस नकली मोर को तुरंत पहचान लिया। जब मोरों ने देखा कि एक कौवा उनके पंख लगाकर उन्हें बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा है, तो उन्हें बहुत गुस्सा आया।
मोरों ने उस कौवे को अपनी चोंच से मार-मार कर बुरा हाल कर दिया। उन्होंने उसके शरीर से सारे 'नकली पंख' नोच डाले और उसे वहां से भगा दिया।
अपनों की फटकार: अपमानित और घायल कौवा रोता हुआ वापस अपने 'कौवों के झुंड' में आया।
परंतु जब उसने अपने कौवा दोस्तों के पास जाने की कोशिश की, तो एक बूढ़े और समझदार कौवे ने उसे रोकते हुए कहा: "रुक जाओ! तुम हमारे बीच रहने लायक नहीं हो। जो इंसान अपने 'असली रूप' से नफरत करता है और झूठा दिखावा करने के लिए अपनों का तिरस्कार करता है, उसका कोई सम्मान नहीं होता। मोरों ने तुम्हें ठुकरा दिया और अब हम भी तुम्हें नहीं अपनाएंगे!"
कौवों ने भी उसे अपने झुंड से बाहर निकाल दिया। बेवकूफ कौवा न तो मोर बन पाया और न ही अपने पुराने दोस्तों का साथ पा सका। वह अकेला बैठकर अपनी मूर्खता पर पछताता रहा।
नीति / सीख: ईश्वर ने हमें जैसा भी बनाया है, हमें अपनी उस पहचान पर गर्व होना चाहिए। झूठा रूप बनाकर और दिखावा करके इंसान केवल अपना सम्मान खोता है।
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