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पंडित, चोर और हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ — चतुराई से बचा खज़ाना

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पंडित, चोर और हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ — चतुराई से बचा खज़ाना

कलिंग देश में राजा इंद्रजीत राज करते थे, जो गुणी और विद्वान लोगों का बहुत सम्मान करते थे। एक दिन उनके दरबार में बंग देश से एक विद्वान पंडित आए, जिनका नाम था चित्रसेन। राजा ने उन्हें आदर सहित बुलाया और उनसे धार्मिक चर्चा करने का अनुरोध किया।

अगले तीन दिनों तक लगातार धर्म-चर्चा होती रही, और चित्रसेन के ज्ञान और वाणी से राजा, रानी और पूरा दरबार बहुत प्रभावित हुआ। राजा के आग्रह पर पंडित चित्रसेन कुछ दिन और महल में रुके। जब विदा का समय आया, तो राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक माला पहनाई और कहा — "गुणी जनों का सम्मान करना राजा का कर्तव्य है" — और उन्हें एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं।

पंडित चित्रसेन राजा से विदा लेकर पैदल ही अपने घर की ओर चल पड़े, क्योंकि उस ज़माने में आम आदमी के लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं था। रास्ते में शाम होते-होते वे एक धर्मशाला में पहुँचे। धर्मशाला छोटी थी और हर कमरे में पहले से आठ-दस यात्री ठहरे हुए थे। खाना खाकर चित्रसेन एक कोने में चटाई बिछाकर लेट गए।

उसी धर्मशाला में एक शख्स भी ठहरा हुआ था, जो पेशे से माहिर चोर था। उसे यह खबर लग चुकी थी कि यह विशिष्ट अतिथि राजदरबार से लौटे हैं और उनके पास इनाम में मिली हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ हैं। चोर ने चुपचाप जाकर चित्रसेन के ठीक बगल में अपनी चटाई बिछा ली और सोने का नाटक करते हुए लेट गया, ताकि रात में मौका पाते ही मुद्राएँ चुरा सके।

रात गहरी होते ही सब सो गए। चित्रसेन की गहरी नींद में नाक बज रही थी। चोर धीरे से उठा और उनके सिर के नीचे रखे तकिए को टटोलने लगा — कुछ नहीं मिला। उसने कमर की तरफ देखा — खाली। कमीज़ की जेब टटोली — वह भी खाली थी। पूरी रात वह चित्रसेन के बिस्तर के इर्द-गिर्द टटोलता रहा, पर मुद्राओं की थैली उसे कहीं नहीं मिली।

असल में हुआ यह था — चोर को देखते ही पहली नज़र में चित्रसेन को उस पर शक हो गया था। इसलिए उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी मुद्राओं की थैली अपने पास न रखकर, चुपके से खुद चोर के ही तकिए के नीचे खिसका दी थी — यह सोचकर कि कोई भी चोर अपने ही तकिए के नीचे तलाशी नहीं लेगा।

सुबह हुई, उजाला फैला। चित्रसेन की नींद खुली, तो चोर ने झट से आँखें बंद करके फिर सोने का नाटक शुरू कर दिया। चित्रसेन उठकर बैठे, अपनी कमीज़ पहनी, और फिर बड़ी सावधानी से चोर के ही तकिए के नीचे हाथ डालकर अपनी मुद्राओं की थैली निकाल ली — और वहाँ से आराम से चलते बने।

चोर रातभर जिसकी तलाश में परेशान रहा, वह थैली उसी के सिर के नीचे पूरी रात पड़ी रही — और उसे पता तक नहीं चला कि वह खुद ही अपने ऊपर पहरा दे रहा था।

🎉 कहानी समाप्त

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