राजा का अजीब सवाल

किसी राज्य में एक राजा था, जिसे अपने दरबारियों को उलझाने और उनकी अक्ल परखने का बड़ा शौक़ था। एक दिन सुबह-सुबह दरबार लगा हुआ था, मंत्री, सेनापति, पंडित सब अपनी-अपनी जगह बैठे थे। राजा को अचानक शरारत सूझी। उसने ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा और बोला —
"आज मेरे मन में एक सवाल उठा है, और मैं चाहता हूँ कि कल तक मुझे इसका सही जवाब मिल जाए। सवाल यह है — 'कौवा काला क्यों होता है, जबकि तोता हरा और मोर रंग-बिरंगा?' जो भी सबसे सटीक जवाब देगा, उसे मुँहमाँगा इनाम मिलेगा। और जो ग़लत जवाब देगा..." — राजा मुस्कुराया — "उसे एक दिन के लिए महल के हाथी की देखभाल करनी होगी।"
दरबारियों में हड़कंप मच गया। यह कोई गंभीर सवाल नहीं था, बल्कि राजा का सिर्फ़ मनोरंजन करने का एक बहाना था, पर हाथी की सेवा का डर सबको सता रहा था।
सबसे पहले राजपंडित खड़े हुए। उन्होंने गंभीर मुद्रा बनाकर कहा — "महाराज, शास्त्रों में लिखा है कि कौवा पिछले जन्म में एक बहुत पापी ब्राह्मण था, इसलिए उसे काला शरीर मिला।"
राजा ने पूछा — "तो तोता और मोर पिछले जन्म में क्या थे?"
पंडितजी हड़बड़ा गए। उन्होंने जल्दी से जोड़ा — "तोता... तोता एक संगीतज्ञ था, और मोर एक नर्तक था महाराज!"
दरबार में हल्की हँसी गूँजी। राजा ने सिर हिलाया और अगले दरबारी की ओर देखा।
सेनापति खड़े हुए और अपनी मूँछों पर ताव देते हुए बोले — "महाराज, यह तो सीधी-सी बात है। कौवा युद्ध में हमेशा सबसे आगे रहकर लड़ता था, तलवारों की कालिख और बारूद के धुएँ से उसका रंग काला पड़ गया।"
राजा ने पूछा — "और तोता? वह तो कभी युद्ध में नहीं गया?"
सेनापति बोले — "तोता... तोता रसोई में रहकर हरी सब्ज़ियाँ खाता रहा, इसीलिए हरा हो गया!"
इस बार पूरा दरबार हँसी से गूँज उठा। एक बूढ़े दरबारी ने खड़े होकर कहा — "महाराज, सच तो यह है कि कौवे ने भगवान से माँगा था 'मुझे सबसे सुंदर रंग दो', पर जल्दी में गंदे पानी के कुंड में गिर पड़ा, इसलिए काला रह गया।"
एक युवा दरबारी, जो अभी-अभी दरबार में नया आया था, यह सब सुनकर हैरान था। जब राजा ने उससे भी पूछा, तो उसने साफ़-साफ़ कहा — "महाराज, मुझे सच में नहीं पता। यह प्रकृति का नियम है, इसका कोई निश्चित कारण मैं नहीं बता सकता। हो सकता है यह सिर्फ़ इसलिए हो क्योंकि हर पक्षी की चमड़ी में अलग-अलग तरह का रंग-द्रव्य होता है।"
पूरा दरबार चुप हो गया। राजा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और पूछा — "तुम्हें यह किसने बताया?"
युवक बोला — "महाराज, मैंने कभी एक विदेशी यात्री से सुना था कि प्रकृति में हर चीज़ का कोई-न-कोई वैज्ञानिक कारण होता है, भले ही हम उसे पूरी तरह समझ न पाएं। मुझे झूठी कहानी गढ़ने से बेहतर यही लगा कि सच बता दूँ कि मुझे नहीं पता।"
राजा कुछ देर चुप रहा, फिर ज़ोर से हँस पड़ा। उसने कहा — "आज तक जितने भी जवाब मिले, सब बड़े मज़ेदार थे, पर सबसे बुद्धिमान जवाब यही है — यह मानने का साहस कि 'मुझे नहीं पता।' झूठी शान दिखाने वाले पंडित और सेनापति कल से एक-एक दिन हाथी की सेवा करेंगे, और यह ईमानदार युवक आज से मेरे विशेष सलाहकार के पद पर नियुक्त होगा।"
तभी से उस राज्य में यह बात मशहूर हो गई कि दरबार में सबसे बड़ी बुद्धिमानी घुमा-फिराकर जवाब देने में नहीं, बल्कि सच्चाई से "मुझे नहीं पता" कहने के साहस में है।
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