राजा और भिखारी की सीख

एक राज्य में एक राजा राज करता था, जिसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। महल में सोने-चाँदी के बर्तन थे, हज़ारों सैनिक थे, दूर-दूर तक फैली उपजाऊ ज़मीनें थीं। पर पिछले कुछ समय से राजा के मन में एक बेचैनी घर कर गई थी। जितना उसके पास था, उतना ही उसे लगता था कि कुछ कमी है। रात को नींद नहीं आती, दिन में मन उदास रहता।
एक दिन राजा ने अपने गुरु से अपनी परेशानी बताई। गुरु ने कहा — "महाराज, हो सकता है आपका मन धन-दौलत में इतना उलझा है कि उसी ने आपकी शांति छीन ली है। एक बार सब कुछ त्याग कर देखिए, शायद सुख वहीं मिल जाए।"
राजा को यह बात जँच गई। उसने उसी दिन ऐलान करवा दिया कि वह अपनी सारी संपत्ति ग़रीबों में बाँट देगा। कुछ ही दिनों में महल के भंडार खाली हो गए, ज़मीनें बँट गईं, गहने-जवाहरात दान हो गए। राजा को लगा कि अब उसे परम शांति मिल जाएगी।
पर हफ़्ते भर बाद भी वही बेचैनी बनी रही। राजा को समझ नहीं आया कि आख़िर कमी कहाँ रह गई। वह वेश बदलकर, एक साधारण यात्री के भेष में, अपने ही राज्य में घूमने निकल पड़ा — यह देखने कि आख़िर सुख कहाँ छिपा है।
घूमते-घूमते शाम हो गई। राजा एक पेड़ के नीचे थका-हारा बैठ गया। तभी उसकी नज़र पास ही बैठे एक भिखारी पर पड़ी, जो एक पुराने कटोरे में बचा-खुचा भोजन खा रहा था, और खाते हुए बड़े सुकून से गुनगुना भी रहा था। उसके शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े थे, पास में कुछ नहीं था, फिर भी उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति और संतोष झलक रहा था।
राजा से रहा नहीं गया। उसने पास जाकर पूछा — "भाई, तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है, फिर भी तुम इतने सुकून से क्यों बैठे हो? मैंने तो अपना सब कुछ दान कर दिया, फिर भी मुझे चैन नहीं मिलता।"
भिखारी हँस पड़ा। उसने कहा — "यात्री महोदय, फ़र्क यह है कि आपने अपनी दौलत त्यागी है, पर शायद अभी भी उसकी याद और उसका हिसाब आपके मन में बना हुआ है — कितना दिया, किसको दिया, बदले में क्या मिलेगा। मैंने कभी कुछ रखा ही नहीं, इसलिए मुझे कुछ छोड़ने की तकलीफ़ भी नहीं उठानी पड़ी। असली त्याग चीज़ों को हाथ से जाने देने में नहीं, बल्कि मन से उनकी चाहत को जाने देने में है।"
राजा यह सुनकर चौंक गया। उसने पूछा — "तो फिर सुख की कुंजी क्या है?"
भिखारी ने अपनी खाली कटोरी की ओर इशारा करते हुए कहा — "देखिए, यह कटोरी खाली है, इसीलिए इसमें जो भी मिल जाए, वह समा जाता है। अगर यह पहले से किसी चीज़ से भरी होती, तो नया कुछ भी इसमें जगह नहीं पाता। हमारा मन भी वैसा ही है — जब तक वह इच्छाओं, हिसाब-किताब और "मैंने इतना त्याग किया" के घमंड से भरा रहता है, तब तक असली संतोष के लिए उसमें जगह ही नहीं बचती।"
राजा देर तक चुपचाप बैठा उन शब्दों पर विचार करता रहा। उसे एहसास हुआ कि उसने धन तो त्याग दिया था, पर मन-ही-मन वह अब भी उस त्याग का हिसाब रख रहा था, उसका श्रेय और सम्मान चाहता था। असली ग़रीबी तो जेब की नहीं, मन की भरी हुई इच्छाओं की थी।
राजा महल लौट आया। उसने फिर से राजकाज सँभाला, पर अब उसका नज़रिया बदल चुका था। वह राज करता रहा, संपत्ति भी रही, पर अब उसने किसी चीज़ को कसकर पकड़े रहना और हर काम का हिसाब-किताब रखना छोड़ दिया। धीरे-धीरे वही बेचैनी जो कभी उसे रातों को जगाए रखती थी, अपने-आप शांत हो गई।
तभी से उस राज्य में यह बात कही जाने लगी — "सुख धन में नहीं, न ही धन त्यागने में है; सुख उस खाली कटोरी जैसे मन में है, जो न किसी चीज़ को कसकर पकड़े, न किसी त्याग का हिसाब रखे।"
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