रेशमी जूतों की बेड़ियाँ

हरियाली से भरे एक छोटे से गाँव में 'माधो' नाम का एक बेहद मेहनती किसान रहता था। माधो का अपनी ज़मीन से एक गहरा और रूहानी नाता था। वह रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले उठता और नंगे पैर ही अपने खेतों में काम करने निकल जाता।
गीली मिट्टी की छुअन और पसीने की महक ही उसकी असली दौलत थी। उसके खेत पूरे गाँव में सबसे लहलहाते हुए होते थे।
एक दिन शहर का एक बड़ा और अमीर व्यापारी किसी काम से गाँव से गुज़र रहा था। अचानक बारिश होने के कारण व्यापारी की बग्घी कच्चे रास्ते के गहरे कीचड़ में फँस गई। व्यापारी परेशान था, तभी माधो ने वहाँ पहुँचकर बिना अपनी परवाह किए, घुटनों तक कीचड़ में उतरकर बग्घी को बाहर निकाल दिया।
माधो की इस निस्वार्थ मदद से व्यापारी बहुत खुश हुआ। उसने देखा कि माधो के पैरों में छाले हैं और वह नंगे पैर है।
शहर लौटकर व्यापारी ने माधो के लिए एक बेहद कीमती तोहफा भेजा— लाल रंग के मखमली और रेशमी जूते। माधो ने अपनी ज़िंदगी में इतने सुंदर और मुलायम जूते कभी नहीं देखे थे। उसने तुरंत उन्हें पहन लिया।
जूते इतने आरामदायक थे कि उसे लगा जैसे वह बादलों पर चल रहा हो। गाँव के लोग भी उसके जूतों की तारीफ करने लगे। लेकिन असली कहानी अगले दिन से शुरू हुई।
जब सुबह माधो खेतों की ओर चला, तो उसने देखा कि रात की बारिश से खेत में कीचड़ हो गया है। उसने अपने शानदार रेशमी जूतों की तरफ देखा और फिर कीचड़ की तरफ। उसे लगा, "अगर मैं इस कीचड़ में गया, तो मेरे इतने महँगे और सुंदर जूते खराब हो जाएंगे।"
उस दिन माधो खेत के किनारे ही खड़ा रहा और बिना ठीक से काम किए वापस लौट आया। यह सिलसिला रोज़ का हो गया। माधो अब उन कामों से बचने लगा जिनमें उसके जूतों पर दाग लगने का डर होता था — न ठीक से क्यारियों में पानी देता और न ही गीली मिट्टी में उतरकर खरपतवार निकालता।
कुछ ही हफ़्तों में इसका असर दिखने लगा। जो खेत हमेशा हरियाली से लहलहाते थे, वे अब सूखने लगे थे। फसलें मुरझा गईं और खरपतवार ने पूरे खेत को घेर लिया।
एक दोपहर माधो अपने खेत की मुंडेर पर बैठा अपनी बर्बाद होती फसल को उदास आँखों से देख रहा था। तभी उसकी नज़र अपने चमकते हुए रेशमी जूतों पर पड़ी। अचानक उसे एक गहरा धक्का लगा।
उसे समझ आ गया कि जिस चीज़ को वह एक बेशकीमती तोहफा समझ रहा था, असल में वह एक सुंदर बेड़ी बन गई थी। इन जूतों ने उसे उस मिट्टी से दूर कर दिया था, जो उसकी असली पहचान और उसका जीवन थी।
माधो ने तुरंत वो रेशमी जूते उतारे और उन्हें एक किनारे रख दिया। उसने एक गहरी साँस ली और अपने नंगे पैर वापस उस गीली, ठंडी मिट्टी में रख दिए। मिट्टी का स्पर्श पाते ही उसे लगा जैसे उसमें फिर से जान आ गई हो। उसने कुदाल उठाई और दोगुनी मेहनत से अपने खेतों को संवारने में जुट गया।
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