समय का फेर

मोहन की साड़ियाँ बिक नहीं रही थीं। वो हथकरघे पर दिन-रात मेहनत करता - पुराने डिज़ाइन, परंपरागत रंग। पर गाँव की औरतें कहतीं - "ये तो पुराने ज़माने की है! हमें तो चमकदार, फ़ैंसी साड़ियाँ चाहिए।"
उसकी पत्नी लक्ष्मी परेशान थी। घर में राशन खत्म होने वाला था। और सबसे बड़ी मुसीबत - जमींदार ठाकुर बलवंत सिंह का कर्ज़। छह हज़ार रुपये। अगले हफ्ते तक नहीं दिया तो मोहन की दुकान और करघा दोनों छिन जाएँगे।
रविवार की दोपहर, ठाकुर आया। रेशमी कुर्ता, सोने की चेन पहने हुए। "मोहन! मेरे पैसे कहाँ हैं?" मोहन हाथ जोड़कर बोला - "ठाकुर साहब, बस एक महीना और। साड़ियाँ बिक जाएँगी तो—"
"एक महीना?" ठाकुर ने ठहाका लगाया। "तुम्हारी घटिया साड़ियाँ कौन खरीदेगा? अगले शनिवार तक पैसे नहीं मिले, तो ये दुकान मेरी! समझे?" मोहन ने विनती की - "ठाकुर साहब, कृपया एक मौका और दीजिए।"
"तो पैसे दो!" ठाकुर चला गया, हँसता हुआ। लक्ष्मी ने मोहन को सांत्वना दी - "कुछ हो जाएगा।" अगले दिन मोहन ने हिम्मत की। उसने अपनी बची हुई दस साड़ियाँ लीं और बाज़ार में रेड़ी लगाई।
पहले दिन - कोई नहीं आया। दूसरे दिन - दो औरतों ने देखा, पर मुँह बनाकर चली गईं। "ये डिज़ाइन तो पुराना है।" तीसरे दिन शाम को, मोहन निराश होकर रेड़ी समेट रहा था। तभी एक गाड़ी रुकी। शहर से आया एक जोड़ा - पति-पत्नी, अच्छे कपड़ों में।
पत्नी ने रेड़ी देखी। चौंककर बोली - "अरे, ये तो हथकरघे की साड़ियाँ हैं! इतने दिनों बाद असली हाथ की बुनी साड़ी मिली!" उसने एक नीली साड़ी उठाई। "देखो जी, कितनी बारीक बुनाई है! ये तो बिल्कुल वैसी है जैसी मेरी दादी पहनती थीं।"
मोहन अचंभित था। "आपको ये पसंद आई?" "पसंद आई? मुझे तो ये सब चाहिए!" औरत ने खुशी से कहा। "आप यहाँ रोज़ आते हैं?" "हाँ, पर... पर किसी को पसंद नहीं आतीं।"
पति आगे आया। "भाई साहब, मेरा नाम राजेश वर्मा है। मैं शहर में कपड़े की दुकान चलाता हूँ। आजकल शहर में ये हथकरघे की साड़ियों की बहुत माँग है। लोग हाथ से बनी चीज़ें ढूँढ रहे हैं!" मोहन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
राजेश बोला - "आप हर महीने कितनी साड़ियाँ बना सकते हैं?" "मैं... मैं अकेला बीस-पच्चीस बना लेता हूँ।" "शानदार! मैं हर महीने बीस साड़ियाँ खरीदूँगा। एक की चार सौ रुपये। मतलब हर महीने आठ हज़ार।" मोहन को विश्वास नहीं हो रहा था। आठ हज़ार महीना!
राजेश ने दस साड़ियाँ खरीद लीं। चार हज़ार रुपये दिए। "अगले महीने मैं फिर आऊँगा।" मोहन खुशी से रोने लगा। अगले दिन उसने चार हज़ार में से तीन हज़ार ठाकुर को दे दिए। "ठाकुर साहब, बाकी तीन हज़ार अगले महीने दे दूँगा।" ठाकुर को गुस्सा आया - वो सोच रहा था कि दुकान उसकी हो जाएगी।
महीने बाद राजेश फिर आया। बीस साड़ियाँ ली। आठ हज़ार दिए। मोहन ने बाकी कर्ज़ चुका दिया। धीरे-धीरे मोहन का काम बढ़ने लगा। उसने दो और बुनकरों को काम पर रखा। अब पैंतालीस साड़ियाँ महीने में बनने लगीं। राजेश खुश था - उसकी दुकान में ये साड़ियाँ बहुत बिकती थीं।
तीन साल में मोहन ने पाँच बुनकरों को रोज़गार दिया। नया करघा खरीदा। घर बड़ा बनवाया। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे। और ठाकुर बलवंत सिंह? उसने जुए में सब गँवा दिया। साहूकारों ने उसकी ज़मीन ले ली। एक दिन वो परेशान होकर बाज़ार में भटक रहा था। फटे कपड़े, उदास चेहरा।
तभी मोहन दिखा। "ठाकुर साहब?" बलवंत का सिर शर्म से झुक गया। "चलिए, चाय पीते हैं," मोहन ने हाथ पकड़ा। चाय की दुकान पर बलवंत बोला - "मोहन, मैंने तुम्हें बहुत सताया। मुझे माफ़ कर दो।"
मोहन मुस्कुराया - "ठाकुर साहब, एक दिन मैं रेड़ी लगाकर बैठा था। निराश था। तभी राजेश जी आए और मेरी ज़िंदगी बदल गई। मैंने समझा - समय का चक्र घूमता रहता है। इसलिए अच्छे वक्त में घमंड नहीं करना चाहिए।" बलवंत की आँखों में आँसू आ गए। "मैं मूर्ख था। मैंने सोचा कि मेरा समय हमेशा अच्छा रहेगा। अब समझ आया - समय कितना ताकतवर है।"
मोहन ने कहा - "ठाकुर साहब, मेरी साड़ियाँ शहर भेजनी होती हैं। आप इसका काम संभाल सकते हैं? डिलीवरी और हिसाब-किताब?" बलवंत ने राहत की साँस ली। "हाँ, ये मैं कर सकता हूँ।" आज, पाँच साल बाद, दोनों साथ बैठकर चाय पीते हैं। गाँव के चौराहे पर एक पत्थर लगा है - "समय का पहिया - सबके जीवन में अच्छे और बुरे दिन आते हैं।"
📚 शिक्षाप्रद कहानियाँ की और कहानियाँ
अंधा गिद्ध और बिलाव — झूठे अजनबियों पर विश्वास का भयंकर परिणाम
एक अंधे गिद्ध ने एक धूर्त बिलाव की मीठी बातों में आकर उसे पनाह दे दी। बिलाव ने पक्षियों के बच्चों को खाकर गिद्ध को फंसा दिया, जिसका परिणाम बेकसूर गिद्ध की मौत के रूप में सामने आया।
पढ़ें →बूढ़ा बाघ और लालची राहगीर — लालच का दलदल और मौत का फंदा
एक बूढ़े और शातिर बाघ ने सोने के कंगन का लालच देकर एक राहगीर को दलदल में फंसा लिया। राहगीर बाघ के धर्म-कर्म के दिखावे में आकर अपनी जान गँवा बैठा।
पढ़ें →हिरण, कौवा और सियार — सच्चे मित्र की चेतावनी और स्वार्थी का अंत
एक सीधे हिरण ने कौवे की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर एक धूर्त सियार से दोस्ती कर ली। सियार ने हिरण को किसान के जाल में फंसा दिया, लेकिन सच्चे मित्र कौवे ने उसकी जान बचाई और सियार अपने ही बुने जाल में मारा गया।
पढ़ें →सोने का हंस — अत्यधिक लालच और जादुई पंखों का रहस्य
एक जादुई सोने का हंस एक गरीब की मदद करने के लिए उसे सोने के पंख देता था। लेकिन उस औरत के लालच ने उसे सब कुछ छीनकर उसे वापस उसी गरीबी में धकेल दिया।
पढ़ें →बुद्धिमान व्यापारी और मरा हुआ चूहा — शून्य से शिखर तक का सफर
एक गरीब लेकिन चतुर लड़के ने एक मरे हुए चूहे से व्यापार शुरू किया और अपनी सूझ-बूझ से नगर का सबसे अमीर व्यापारी बन गया।
पढ़ें →खरगोश का खौफ: 'आसमान गिर रहा है!' — अफ़वाहों का अंधा तूफान
एक डरपोक खरगोश ने फल गिरने की आवाज़ को आसमान गिरना समझ लिया और पूरे जंगल में अफ़वाह फैलाकर भयंकर भगदड़ मचा दी। शेर ने अपनी सूझबूझ से जानवरों को सच्चाई से अवगत कराया।
पढ़ें →