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तीन बहरे पड़ोसियों का संवाद

लोक परंपरा — भारतीय लोककथा6 मिनट का पठन
तीन बहरे पड़ोसियों का संवाद

एक गाँव में तीन लोग रहते थे— एक किसान, एक मुसाफिर और किसान की पत्नी। इत्तेफाक की बात यह थी कि ये तीनों के तीनों 'ऊँचा सुनते थे' (गहरे बहरे थे)। इन्हें सामने वाले की बात बिल्कुल सुनाई नहीं देती थी, ये सिर्फ सामने वाले के होंठ हिलते देखकर अपने मन से अंदाज़ा लगा लेते थे कि वह क्या कह रहा है।

एक दिन सुबह-सुबह वह बहरा किसान अपने खेत में कुदाल से एक बहुत गहरा 'गड्ढा' खोद रहा था।

तभी वहाँ से एक बहरा 'मुसाफिर' गुज़रा। मुसाफिर को शहर जाने का रास्ता पूछना था।

मुसाफिर ने खेत की मेड़ पर खड़े होकर किसान की तरफ हाथ हिलाया और ज़ोर से पूछा: "ऐ भाई! ज़रा सुनना! क्या यह कच्चा रास्ता सीधे 'शहर' की तरफ जाता है?"

किसान को कुछ सुनाई नहीं दिया। उसने सिर्फ मुसाफिर के होंठ हिलते देखे और मुसाफिर का हाथ देखा। किसान ने अपने मन में सोचा: "यह आदमी ज़रूर मुझसे पूछ रहा है कि मैं यह गड्ढा किस लिए खोद रहा हूँ।"

किसान ने अपनी कुदाल ज़मीन पर मारी और बहुत ही गर्व से ज़ोर से चिल्लाकर जवाब दिया: "अरे भाई! मैं यह गड्ढा 'मूली' बोने के लिए खोद रहा हूँ! बहुत बढ़िया और लंबी-लंबी मूलियाँ उगाने वाला हूँ इस बार!"

मुसाफिर को भी किसान की आवाज़ बिल्कुल सुनाई नहीं दी। उसने सिर्फ किसान को कुदाल मारते और गुस्से में चिल्लाते हुए देखा। मुसाफिर ने अपने मन में सोचा: "बाप रे! यह आदमी तो बहुत लालची और झगड़ालू लगता है। यह ज़रूर मुझे रास्ता बताने के बदले में मुझसे 'पैसे' माँग रहा है।"

मुसाफिर ने अपने खाली हाथ हवा में लहराए और गुस्से में चिल्लाया: "अरे जा-जा! अपना काम कर! मेरे पास तुझे देने के लिए 'फूटी कौड़ी' (एक भी पैसा) नहीं है! मैं तो बिना रास्ता पूछे ही खुद शहर चला जाऊँगा!"

किसान ने मुसाफिर को हवा में हाथ लहराते और गुस्से में जाते देखा। किसान ने सोचा: "अच्छा! यह आदमी कह रहा है कि मेरी उगाई हुई मूलियाँ खराब और सड़ी हुई होंगी।"

किसान कुदाल लेकर मुसाफिर की तरफ दौड़ा, "रुक जा बेवकूफ़! तूने मेरी मूलियों को खराब कैसे कहा?" मुसाफिर ने देखा कि किसान कुदाल लेकर आ रहा है, तो वह भी डंडा लेकर खड़ा हो गया, "तू मुझसे ज़बरदस्ती पैसे कैसे माँग सकता है?"

दोनों बहरे बीच सड़क पर एक-दूसरे को गालियाँ देने लगे और लड़ने लगे। दोनों अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलाप रहे थे।

तभी वहाँ उस बहरे किसान की 'बहरी पत्नी' आ गई। उसके सिर पर एक टोकरी थी, जिसमें वह अपने पति के लिए दोपहर का 'खाना' (रोटी और दाल) लेकर आई थी।

पत्नी ने देखा कि उसका पति एक अजनबी मुसाफिर से लड़ रहा है। पत्नी ने दोनों के बीच में आकर उन्हें अलग किया और ज़ोर से चिल्लाई, "क्या हुआ? तुम दोनों बीच सड़क पर जानवरों की तरह क्यों लड़ रहे हो?"

किसान ने मुसाफिर की तरफ इशारा करते हुए अपनी पत्नी से कहा: "देख भागवान! यह आदमी कह रहा है कि मेरी उगाई हुई मूलियाँ कड़वी और सड़ी हुई होंगी! मैं इसे छोडूँगा नहीं।"

मुसाफिर ने किसान की तरफ इशारा करते हुए पत्नी से कहा: "बहन जी! यह आपका पति एक नंबर का लुटेरा है। मैं तो सिर्फ रास्ता पूछ रहा था, और यह रास्ता बताने के बदले मुझसे ज़बरदस्ती पैसे माँग रहा है!"

बहरी पत्नी को उन दोनों की एक भी बात सुनाई नहीं दी। उसने देखा कि दोनों आदमी उसकी तरफ इशारा करके ज़ोर-ज़ोर से हाथ हिला रहे हैं और गुस्से में हैं।

पत्नी ने अपने मन में बहुत ही 'महान और बेतुका' अंदाज़ा लगाया। उसने सोचा: "हे भगवान! ये दोनों आदमी ज़रूर मेरे बनाए हुए 'खाने' की बुराई कर रहे हैं। इन्हें ज़रूर मेरा खाना बहुत खराब लगा है।"

बहरी पत्नी ने अपना सिर पीट लिया और उन दोनों को घूरते हुए बहुत ही भावुक होकर ज़ोर से चिल्लाकर कहा:

"अरे मुझे पता है कि आज की दाल में 'नमक' थोड़ा ज़्यादा गिर गया है! और रोटियाँ थोड़ी जल गई हैं! लेकिन इसमें मेरी क्या गलती है? वह तो पड़ोसिन की काली बिल्ली रसोई में घुस आई थी और उसने दूध का बर्तन गिरा दिया था। मैं उसे भगाने गई, तो दाल में नमक ज़्यादा डल गया! तुम दोनों इस ज़रा सी बात के लिए मेरी जान क्यों खा रहे हो?"

अब किसान और मुसाफिर हक्के-बक्के रह गए! लड़ाई हो रही थी 'मूली' और 'रास्ते' की, और बीच में आ गई 'काली बिल्ली और नमक वाली दाल'!

तभी वहाँ से गाँव का एक कान का डॉक्टर (हकीम) गुज़रा, जिसके कान बिल्कुल ठीक थे। उसने जब उन तीनों की यह 'महान बातचीत' सुनी, तो वह हँसते-हँसते ज़मीन पर लोट-पोट हो गया। उस दिन के बाद से यह किस्सा हमेशा के लिए यह बताने के लिए मशहूर हो गया कि बिना सुने और सिर्फ 'अंदाज़ा' लगाकर बात करने का अंजाम कितना हास्यपूर्ण हो सकता है!

🎉 कहानी समाप्त

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