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पंडित जी की खीर और चालाक बिल्ली

लोक परंपरा — भारतीय लोककथा6 मिनट का पठन
पंडित जी की खीर और चालाक बिल्ली

एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। वे पूजा-पाठ के बहुत पक्के थे, लेकिन खाने-पीने के मामले में उनका लालच पूरे गाँव में मशहूर था। वे हमेशा इंतज़ार करते रहते थे कि कब किसी यजमान के घर से कोई बढ़िया 'सीधा' (कच्चा राशन) आए और वे पकवान बनाकर खाएँ।

एक दिन गाँव के सबसे अमीर ठाकुर साहब के घर से पंडित जी को बहुत सारा दान मिला। दान में एक बर्तन भरकर गाढ़ा दूध, बासमती चावल, ढेर सारी चीनी, और मेवे (काजू, बादाम, किशमिश) मिले।

पंडित जी की बांछें खिल गईं। उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी से कहा: "पंडिताइन! आज तो ठाकुर जी ने कमाल कर दिया। ऐसा करो, चूल्हा जलाओ और इस सारे सामान से एक बड़ी सी कड़ाही भरकर 'खीर' बनाओ। आज तो मैं छक कर खीर खाऊँगा!"

पंडिताइन ने चूल्हे पर खीर चढ़ाई। दूध उबलने लगा, उसमें चावल और मेवे डल गए। पूरे घर में बासमती चावल और इलायची की वह मीठी और मदहोश कर देने वाली खुशबू फैल गई।

पंडित जी बार-बार रसोई का चक्कर लगा रहे थे। "कितनी देर है पंडिताइन? खीर बन गई क्या?" पंडिताइन ने झुँझलाकर कहा, "खीर तैयार है। मैंने इसे एक बड़े से पीतल के परात (थाली) में ठंडी होने के लिए आँगन में रख दिया है। आप जाकर नहा-धो आइए, फिर खा लेना।"

पंडित जी ने परात में रखी उस मलाईदार और मेवों से सजी खीर को देखा तो उनके मुँह में पानी का झरना बहने लगा।

पंडित जी ने सोचा: "खीर तो बहुत शानदार बनी है। लेकिन मैं ठहरा भगवान का सच्चा भक्त। बिना 'भगवान को भोग लगाए' मैं यह खीर कैसे खा सकता हूँ? मुझे पहले स्नान करके, भगवान का लंबा ध्यान लगाना चाहिए, फिर मैं यह खीर खाऊँगा।"

पंडित जी जल्दी से नहाकर आए। उन्होंने साफ कपड़े पहने, माथे पर बड़ा सा चंदन का तिलक लगाया और उस खीर के परात के बिल्कुल सामने एक कुशा (घास) का आसन बिछाकर 'ध्यान' में बैठ गए।

पंडित जी ने अपनी दोनों आँखें ज़ोर से बंद कर लीं और ज़ोर-ज़ोर से मंतर पढ़ने लगे: "ॐ भूर्भुव: स्व:...! हे भगवान! यह स्वादिष्ट खीर मैं आपको अर्पित कर रहा हूँ... इसका भोग लगाइए... स्वाहा!"

उसी समय, पंडित जी के घर की छत पर एक बहुत ही 'चालाक और भूखी बिल्ली' बैठी हुई थी। बिल्ली के नथुनों में जैसे ही खीर की खुशबू पहुँची, वह छलाँग लगाकर आँगन में आ गई।

बिल्ली ने देखा कि एक बहुत बड़ी परात में गरमा-गरम और स्वादिष्ट खीर रखी है और उसके ठीक सामने पंडित जी आँखें बंद करके ज़ोर-ज़ोर से मंतर पढ़ रहे हैं और अपनी गरदन हिला रहे हैं।

बिल्ली बहुत होशियार थी। वह दबे पाँव, बिना कोई आवाज़ किए खीर की परात के बिल्कुल पास आ गई।

पंडित जी आँखें बंद किए हुए मगन थे: "हे प्रभु! आइए! यह काजू और बादाम वाली खीर ग्रहण कीजिए!"

बिल्ली ने सोचा: "अरे वाह! पंडित जी तो मुझे ही बुला रहे हैं!" बिल्ली ने अपना मुँह उस पीतल की परात में डाला और बहुत ही मज़े से 'चप-चप... चप-चप' करके खीर खाना शुरू कर दिया।

पंडित जी को 'चप-चप' की आवाज़ आई। उन्होंने आँखें बंद किए-किए ही सोचा: "आहा! लगता है भगवान सच में मेरे बुलाने पर आ गए हैं और मेरी खीर का भोग लगा रहे हैं। भगवान कितनी ज़ोर-ज़ोर से चप-चप करके खा रहे हैं। बस भगवान थोड़ा सा 'प्रसाद' मेरे लिए छोड़ दें, तो मज़ा आ जाए!"

बिल्ली बहुत भूखी थी। उसने पाँच मिनट के अंदर उस परात की सारी की सारी खीर चट कर दी। काजू, बादाम, किशमिश— सब कुछ साफ! परात को जीभ से चाट-चाट कर बिल्कुल आईने की तरह चमका दिया।

खीर खत्म करने के बाद, बिल्ली का पेट गुब्बारे की तरह फूल गया। बिल्ली ने परात के पास बैठकर एक बहुत ज़ोरदार 'डकार' ली— "म्याऊँ... बुर्रर्प!" और दीवार फाँद कर भाग गई।

डकार और 'म्याऊँ' की आवाज़ सुनकर पंडित जी का 'ध्यान' टूट गया।

"अरे! भगवान म्याऊँ क्यों कर रहे हैं?" पंडित जी ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं।

सामने का नज़ारा देखकर पंडित जी के होश उड़ गए! वह पीतल की परात बिल्कुल 'खाली' और 'साफ' पड़ी थी। उसमें खीर का एक सफेद दाना भी नहीं बचा था। दीवार के ऊपर से वह मोटी बिल्ली अपनी पूँछ हिलाती हुई उन्हें चिढ़ाकर जा रही थी।

पंडित जी ने अपना सिर पकड़ लिया और ज़ोर से चिल्लाए: "हाय राम! मैं लुट गया! मेरी काजू-बादाम वाली खीर! मैं यहाँ आँखें बंद करके भगवान को भोग लगाता रहा, और वह कलियुगी बिल्ली मेरी सारी तपस्या (और खीर) खा गई!"

पंडिताइन रसोई से बाहर आई। उसने जब खाली परात देखी और पंडित जी को रोते हुए देखा, तो वह अपना पेट पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

पंडिताइन ने ताना मारते हुए कहा: "पंडित जी! शास्त्रों में लिखा है कि भगवान को 'सच्चे मन' से याद करना चाहिए, 'लंबे मंतरों' से नहीं! जब सामने इतनी स्वादिष्ट खीर रखी हो, तो 'आँखें खोलकर' भगवान को भोग लगाना चाहिए था। अब बैठिए खाली परात के सामने और बिल्ली का जूठा परात साफ कीजिए!"

बेचारे पंडित जी अपनी आँखें बंद करने की बेवकूफी और अपने लालच पर पछताते रहे, और गाँव वालों के लिए यह एक बहुत ही मज़ेदार चुटकुला बन गया!

🎉 कहानी समाप्त

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