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एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ

शरद जोशी8 मिनट का पठन
एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ

एक समय की बात है, एक राज्य का नवाब (शासक) बहुत ही घमंडी और बेवकूफ़ था। उसके दरबार के सारे मंत्री और अधिकारी 'जी-हुज़ूरी' (चापलूसी) करने में इतने माहिर थे कि वे नवाब की हर मूर्खतापूर्ण बात पर भी वाह-वाह किया करते थे।

उसी राज्य के एक गरीब मोहल्ले में 'जुम्मन' नाम का एक सीधा-सादा धोबी रहता था। जुम्मन के पास एक बहुत ही प्यारा और मेहनती गधा था, जिससे वह बेतहाशा प्यार करता था। जुम्मन ने बड़े लाड़-प्यार से अपने उस गधे का एक भारी-भरकम और शाही नाम रखा हुआ था— 'अलादाद खाँ'!

एक रात, जुम्मन के गधे 'अलादाद खाँ' की बीमारी के कारण मौत हो गई। जुम्मन के लिए उसका गधा ही उसकी रोज़ी-रोटी और परिवार था। गधे की मौत से जुम्मन टूट गया और वह आधी रात को अपने घर के बाहर छाती पीट-पीट कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।

"हाय अलादाद खाँ! तू मुझे छोड़कर क्यों चला गया! तेरे बिना मैं कैसे जिऊँगा अलादाद खाँ! हाय अल्लाह, मेरा अलादाद खाँ मर गया!" जुम्मन दहाड़ें मार कर रो रहा था।

उसी समय नगर का 'कोतवाल' अपनी रात की गश्त पर उस मोहल्ले से गुज़र रहा था। उसने जुम्मन को इतनी बुरी तरह रोते हुए सुना।

कोतवाल ने रुक कर जुम्मन से पूछा, "अरे भाई! क्या हो गया? इतनी रात को क्यों रो रहा है?"

जुम्मन ने रोते-रोते सुबकते हुए कहा, "कोतवाल साहब! मेरा 'अलादाद खाँ' गुज़र गया! वह बहुत नेक था, बहुत सीधा था, मेरा सारा बोझ उठाता था। मैं लुट गया!"

कोतवाल ने जब 'अलादाद खाँ' जैसा भारी-भरकम और इज़्ज़तदार नाम सुना, तो उसे लगा कि 'अलादाद खाँ' ज़रूर कोई बहुत बड़ा संत, फ़कीर या शहर का कोई बहुत ही रईस और इज़्ज़तदार आदमी होगा।

कोतवाल ने बिना पूरी बात जाने, सीधे नवाब के महल की तरफ दौड़ लगा दी।

महल पहुँचकर कोतवाल ने नवाब साहब को जगाया और बहुत ही दुख भरे लहज़े में कहा, "हुज़ूर! शहर में गज़ब हो गया! एक बहुत ही अज़ीम (महान) हस्ती, जनाब 'अलादाद खाँ' साहब का आज इंतकाल (निधन) हो गया है! पूरा शहर उनके गम में डूब गया है।"

नवाब ने अपनी ज़िंदगी में कभी 'अलादाद खाँ' का नाम नहीं सुना था। लेकिन जब कोतवाल ने इतने दुख के साथ यह बात कही, तो नवाब ने अपनी शान बनाए रखने के लिए झूठा नाटक किया।

नवाब ने लंबी साँस खींचते हुए कहा, "हाय-हाय! क्या बात करते हो? अलादाद खाँ साहब गुज़र गए? वे तो बहुत ही महान इंसान थे। मेरे तो वे बहुत ही अज़ीज़ (करीबी) दोस्त थे। उनका जाना राज्य के लिए बहुत बड़ा नुकसान है!"

नवाब को रोता देख दरबार के मंत्री और सिपाही भी झूठे आँसू बहाने लगे। नवाब ने तुरंत शाही फरमान जारी कर दिया: "जनाब अलादाद खाँ साहब के निधन के गम में पूरे राज्य में 'तीन दिन का राष्ट्रीय शोक' घोषित किया जाता है! बाज़ार बंद कर दिए जाएँ, झंडे झुका दिए जाएँ और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अलादाद खाँ का जनाज़ा निकाला जाए!"

अगले दिन सुबह, जुम्मन धोबी अपने मरे हुए गधे को एक पुरानी ठेला-गाड़ी पर रखकर, रोता हुआ उसे दफनाने के लिए कब्रिस्तान ले जा रहा था।

तभी पीछे से शाही बैंड बाजों की धुन सुनाई दी। नवाब साहब, उनका पूरा दरबार, कोतवाल और शहर की हज़ारों की भीड़ रोते-पीटते जुम्मन की तरफ आ रही थी।

कोतवाल ने आगे बढ़कर जुम्मन को रोका और कहा, "हटो पीछे! अलादाद खाँ साहब का जनाज़ा नवाब साहब खुद अपने शाही कंधों पर उठाएँगे!"

सिपाहियों ने जुम्मन के उस 'मरे हुए गधे' को रेशमी कपड़ों से ढक दिया, उस पर गुलाब के फूल डाले और नवाब साहब ने रोते हुए उसे कंधा दिया। पूरे शहर के लोग उस 'महान हस्ती' के गम में आँसू बहा रहे थे।

जुम्मन धोबी भीड़ के किनारे खड़ा, हैरान और परेशान होकर यह सब देख रहा था कि आखिर नवाब साहब उसके गधे को इतनी इज़्ज़त क्यों दे रहे हैं!

कब्रिस्तान पहुँचने पर एक बहुत ही शानदार कब्र खोदी गई। गधे को रेशमी कफन में लपेट कर दफनाया जाने लगा।

दफनाने से पहले, नवाब साहब ने अपने आँसू पोंछे और जुम्मन (जो सबसे ज़्यादा रो रहा था) के पास जाकर बड़ी हमदर्दी से पूछा: "भाई! मैं तो अलादाद खाँ साहब को बहुत अच्छी तरह जानता था। लेकिन तुम इतना क्यों रो रहे हो? तुम्हारा अलादाद खाँ साहब से क्या रिश्ता था?"

जुम्मन ने हाथ जोड़कर और अपनी नाक पोंछते हुए बहुत ही मासूमियत से कहा: "हुज़ूर! रिश्ता क्या होना था... ये जनाब तो मेरे 'गधे' थे! मैं इन पर रोज़ कपड़े लादकर घाट पर ले जाता था!"

"क्या!!!" नवाब साहब के कानों से धुँआ निकल गया। उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। "गधा? तूने अपने गधे का नाम अलादाद खाँ रखा था? और मैंने... मैंने एक गधे के मरने पर राज्य में राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया? मैंने एक गधे के जनाज़े को अपना कंधा दिया?"

नवाब साहब का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। उन्होंने गुस्से से कोतवाल की तरफ देखा, जिसने उन्हें आधी रात को यह खबर दी थी। कोतवाल डर के मारे काँपने लगा।

नवाब साहब को समझ आ गया कि अगर यह बात शहर की जनता को पता चली कि नवाब ने एक गधे के गम में आँसू बहाए हैं, तो उनकी पूरी ज़िंदगी थू-थू होगी और उनकी हुकूमत का मज़ाक बन जाएगा।

सियासत बहुत चालाक होती है। नवाब साहब ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए तुरंत अपना पैंतरा बदला।

नवाब साहब ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और जनता की तरफ पलटकर एक ज़ोरदार भाषण दिया: "भाइयो! यह आदमी (जुम्मन) सदमे के कारण पागल हो गया है! इसे अलादाद खाँ साहब 'गधे' नज़र आ रहे हैं। जनाब अलादाद खाँ कोई गधे नहीं थे, बल्कि एक बहुत बड़े 'पहुँचे हुए संत' और सूफी फ़कीर थे! इन्होंने ही तो अपने चमत्कारों से हमारे राज्य की रक्षा की है!"

यह कहते ही नवाब साहब ने सिपाहियों को इशारा किया। सिपाहियों ने तुरंत जुम्मन धोबी का मुँह बंद किया और उसे खींचकर पीछे ले गए ताकि वह किसी को 'गधे' की सच्चाई न बता सके।

इसके बाद, नवाब साहब के आदेश पर उसी गधे की कब्र पर संगमरमर का एक बहुत ही शानदार 'मकबरा' बनवाया गया!

हर साल उस गधे की मज़ार पर 'उर्स' (मेला) लगने लगा। दूर-दूर से लोग आकर 'अलादाद खाँ बाबा' की मज़ार पर चादर चढ़ाने लगे और मन्नतें माँगने लगे।

और इस तरह, एक गरीब धोबी का बेचारा गधा, सत्ता की मूर्खता और चापलूसी के कारण पूरे राज्य का सबसे पूजनीय 'संत' बन गया! और जुम्मन धोबी ज़िंदगी भर यह नहीं समझ पाया कि लोग उसके गधे से मन्नतें क्यों माँग रहे हैं!

🎉 कहानी समाप्त

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