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👑 अकबर-बीरबल

सल्तनत के पांच महामूर्ख — अहंकार का आइना और बीरबल का अदम्य साहस

लोक परंपरा — अकबर-बीरबल5 मिनट का पठन
सल्तनत के पांच महामूर्ख — अहंकार का आइना और बीरबल का अदम्य साहस

गर्मियों के दिन थे। शहंशाह अकबर का दरबार (दीवान-ए-खास) लगा हुआ था, परंतु आज किसी गंभीर राजनीतिक विषय पर चर्चा नहीं हो रही थी। शहंशाह का मिजाज़ थोड़ा मजाकिया था। वे अपने दरबारियों की बातों पर हंस रहे थे।

तभी अकबर के मन में एक अजीब सा ख्याल आया। उन्होंने पूरे दरबार पर नज़र दौड़ाई और बीरबल को संबोधित करते हुए कहा, "बीरबल! मैं जानता हूँ कि मुग़ल सल्तनत में तुम्हारे जैसे कई अक्लमंद और विद्वान लोग मौजूद हैं। परंतु आज मेरी यह जानने की इच्छा है कि हमारी सल्तनत में कितने मूर्ख हैं!"

बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, "जहाँपनाह! दुनिया में अक्लमंदों से ज़्यादा तादाद मूर्खों की ही होती है।"

अकबर ने तुरंत एक शाही फरमान सुना दिया: "तो ठीक है बीरबल! मैं तुम्हें एक महीने का वक्त देता हूँ। इस एक महीने के भीतर तुम्हें मुग़ल सल्तनत के 'पांच सबसे बड़े महामूर्खों' को खोजकर मेरे सामने इस दरबार में पेश करना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाए, तो तुम्हें वज़ीर-ए-आज़म के पद से हटा दिया जाएगा!"

मुल्ला दो प्याज़ा और अन्य दरबारी यह सुनकर मन ही मन नाचने लगे कि अब बीरबल मूर्खों को खोजते-खोजते खुद पागल हो जाएगा। बीरबल ने सिर झुकाकर शहंशाह का आदेश स्वीकार कर लिया।

मूर्खों की खोज (तीन अद्भुत नमूने): बीरबल अगले ही दिन अपना वेश बदलकर मूर्खों की तलाश में निकल पड़े।

पहला महामूर्ख: कुछ दिन भटकने के बाद, बीरबल ने देखा कि एक आदमी घोड़े पर बैठा यात्रा कर रहा है। परंतु हैरानी की बात यह थी कि उस आदमी ने अपने सिर पर घास का एक बहुत भारी गठ्ठर रखा हुआ था। बीरबल ने उसे रोका और पूछा, "भले आदमी! तुम घोड़े पर बैठे हो, तो यह भारी गठ्ठर अपने सिर पर क्यों रखा है? इसे घोड़े की पीठ पर क्यों नहीं रख देते?" उस आदमी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, "अरे श्रीमान! मेरा घोड़ा बहुत कमज़ोर है। मेरे शरीर का वज़न ही यह मुश्किल से उठा पा रहा है। यदि मैं घास का वज़न भी इस पर डाल दूँ, तो यह बेचारा मर ही जाएगा। इसलिए घास का वज़न मैं खुद उठा रहा हूँ!" बीरबल मन ही मन मुस्कुराए और उसे एक अशरफी देकर अपने साथ चलने को कहा।

दूसरा महामूर्ख: कुछ दिन और बीते। रात का समय था। बीरबल ने देखा कि एक आदमी सड़क पर जलने वाले एक दीपक की रोशनी के नीचे ज़मीन पर पागलों की तरह कुछ ढूंढ रहा है। बीरबल ने पूछा, "भाई, क्या खो गया है?" आदमी ने रोते हुए कहा, "मेरा सोने का सिक्का गिर गया है।" बीरबल भी उसकी मदद करने लगे। बहुत देर खोजने पर भी सिक्का नहीं मिला। बीरबल ने पूछा, "सिक्का ठीक किस जगह गिरा था?" उस आदमी ने दूर अंधेरे में खड़े एक बड़े पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, "गिरा तो वहां उस अंधेरे पेड़ के नीचे था!" बीरबल ने अपना सिर पीट लिया और कहा, "अरे मूर्ख! जब सिक्का वहां गिरा था, तो यहाँ क्यों ढूंढ रहे हो?" आदमी ने तपाक से कहा, "क्योंकि वहां बहुत अंधेरा है! रोशनी तो यहाँ दीपक के नीचे है, इसलिए यहीं ढूंढूँगा न!" बीरबल ने उसे भी अपने साथ ले लिया।

तीसरा महामूर्ख: एक महीने का समय पूरा होने वाला था। बीरबल एक नाव में बैठकर यमुना नदी पार कर रहे थे। उन्होंने देखा कि उनके साथ नाव में बैठा एक आदमी अचानक अपनी जेब से एक सोने का कलश निकालता है और उसे पानी में डुबो कर छोड़ देता है। कलश नदी में डूब जाता है। फिर वह आदमी एक खड़िया (Chalk) निकालता है और पानी की लहरों पर एक निशान बनाने की कोशिश करता है! बीरबल ने पूछा, "तुम यह क्या कर रहे हो?" आदमी ने गर्व से कहा, "मैंने अपना खज़ाना इस नदी में छिपा दिया है। और याद रखने के लिए, मैंने पानी की लहर पर निशान बना दिया है ताकि वापसी में मैं अपना खज़ाना यहीं से निकाल सकूँ!" बीरबल को अपना तीसरा महामूर्ख मिल गया था।

दीवान-ए-खास की पेशी: एक महीने बाद, दरबार खचाखच भरा था। बीरबल उन तीनों आदमियों को लेकर शहंशाह के सामने हाज़िर हुए।

अकबर ने उत्सुकता से पूछा, "कहो बीरबल, क्या तुम पांच महामूर्खों को ले आए?" बीरबल ने उन तीनों को आगे किया और उनकी मूर्खता के किस्से (सिर पर घास, रोशनी में सिक्का ढूंढना, और पानी पर निशान लगाना) पूरे दरबार को सुनाए। तीनों की बेवकूफी सुनकर पूरा दरबार और स्वयं अकबर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

हंसी रुकने के बाद अकबर ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा, "बीरबल! ये तीनों तो वाकई दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख हैं। परंतु ये तो केवल तीन ही हैं। मैंने तुमसे पांच महामूर्ख मांगे थे! बाकी के दो कहाँ हैं?"

बीरबल का अदम्य साहस और चौथा-पांचवां मूर्ख: बीरबल ज़रा भी नहीं घबराए। उन्होंने अत्यंत शांति और निर्भयता के साथ भरे दरबार में कहा: "जहाँपनाह! बाकी के दो महामूर्ख भी इसी दरबार में मौजूद हैं!"

अकबर ने आंखें तरेरते हुए कहा, "कौन हैं वे? उनके नाम बताओ!"

बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा: "हुज़ूर! गुस्ताखी माफ़ हो। मुग़ल सल्तनत का चौथा महामूर्ख मैं स्वयं (बीरबल) हूँ! जो अपनी सारी अक्ल और कीमती वक़्त राज्य की भलाई और जनता के काम में लगाने के बजाय, एक महीने तक गलियों में मूर्खों को ढूंढता फिरता रहा!"

पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। बीरबल की इस बात में एक बहुत गहरी चोट थी।

अकबर का गला सूख गया, उन्होंने धीरे से पूछा, "और बीरबल... पांचवां महामूर्ख कौन है?"

बीरबल ने शहंशाह की आंखों में सीधे देखते हुए, एक सच्चे वज़ीर की तरह कहा: "हुज़ूर! मेरी जान की सलामती हो तो कहूँ। इस सल्तनत का पांचवां और सबसे बड़ा महामूर्ख इस तख्त पर बैठा है! वह शहंशाह, जिसने अपने सबसे योग्य और समझदार वज़ीर को प्रजा के ज़रूरी काम छोड़कर, मूर्खों को खोजने के इस बेतुके और व्यर्थ काम पर लगा दिया!"

अहंकार का आइना: दरबारियों की सांसें अटक गईं। मुल्ला दो प्याज़ा ने सोचा कि आज तो पक्का बीरबल का सिर कलम हो जाएगा। किसी शहंशाह को भरे दरबार में महामूर्ख कहने की हिम्मत आज तक किसी ने नहीं की थी।

परंतु अकबर कोई साधारण राजा नहीं थे। वे क्रोधित होने के बजाय कुछ देर शांत रहे। फिर अचानक उनके होठों पर मुस्कान आ गई और वे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।

अकबर अपनी जगह से उठे, बीरबल के पास आए और उन्हें गले लगा लिया। उन्होंने कहा: "सत्य कहा बीरबल! एक राजा का समय मूर्खताओं में नहीं, प्रजा की भलाई में बीतना चाहिए। तुमने अपनी जान की परवाह किए बिना मुझे मेरे अहंकार और मेरी गलती का आइना दिखा दिया। तुम जैसा सच्चा मित्र और वज़ीर ही इस सल्तनत की असली ताकत है।"

अकबर ने बीरबल को ढेरों इनाम दिए और उन तीनों मूर्खों को भी कुछ पैसे देकर उनके घर भिजवा दिया गया।

(यह कहानी सिखाती है कि एक सच्चा मित्र और सलाहकार वही है जो राजा को उसकी गलती बताने से न डरे।

🎉 कहानी समाप्त

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