बुद्धि का घड़ा — विदेशी राजा की चुनौती और बीरबल की अनोखी 'बुद्धि'

मुग़ल सल्तनत की बढ़ती हुई ताकत और शहंशाह अकबर के दरबार की बुद्धिमत्ता के चर्चे पूरे जंबूद्वीप (एशिया) में फैले हुए थे। पड़ोसी मुल्कों के राजा अक्सर अकबर की अक्ल को चुनौती देने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
एक दिन, 'लंका' के राजा का एक विशेष दूत आगरा के दीवान-ए-खास में पहुँचा। दूत ने शहंशाह अकबर को सलाम किया और अपने साथ लाया हुआ एक साधारण सा मिट्टी का खाली घड़ा दरबार के बीचों-बीच रख दिया। घड़े का मुँह बहुत ही छोटा था, लेकिन अंदर से वह काफी बड़ा था।
लंका के राजा की चुनौती: दूत ने सीना तानकर एक अत्यंत व्यंग्यात्मक स्वर में कहा: "शहंशाह की जय हो! हमारे लंका नरेश ने सुना है कि आपके दरबार में बुद्धि का अथाह सागर बहता है। इसीलिए, उन्होंने आपके लिए यह खाली घड़ा भेजा है।"
अकबर ने हैरानी से पूछा, "इस खाली मिट्टी के घड़े का हम क्या करें?"
दूत ने मुस्कुराते हुए अपनी चुनौती रखी: "जहाँपनाह! हमारे महाराज की शर्त यह है कि आपको इस घड़े को अपनी 'बुद्धि' से ऊपर तक लबालब भरना है! परंतु हमारी तीन अत्यंत कड़ी शर्तें हैं— पहली: घड़े में भरी जाने वाली 'बुद्धि' बिल्कुल ठोस होनी चाहिए, जिसे देखा और छुआ जा सके। दूसरी: इस बुद्धि को घड़े के अंदर डालते समय, न तो घड़े को तोड़ा जा सकता है और न ही उसे काटा जा सकता है। तीसरी: यदि आप एक महीने के भीतर हमें यह 'बुद्धि का घड़ा' नहीं दे पाए, तो आपको लंका नरेश के सामने अपनी हार माननी होगी!"
दरबारियों की विफलता और बेचैनी: चुनौती सुनकर पूरे दीवान-ए-खास में सन्नाटा छा गया। यह कैसी बेतुकी और असंभव मांग थी?
मुल्ला दो प्याज़ा ने फुसफुसाते हुए कहा, "अरे! बुद्धि कोई चावल या सोने के सिक्के थोड़ी है जिसे मुट्ठी में भरकर घड़े में डाल दिया जाए। बुद्धि तो इंसान के दिमाग में होती है। यह लंका का दूत हमारा मज़ाक उड़ा रहा है।" सेनापति मान सिंह और राजा टोडरमल भी उलझन में थे। किसी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि एक भौतिक घड़े में 'बुद्धि' कैसे भरी जाए।
अकबर का गुस्सा और बेचैनी बढ़ने लगी। उन्होंने अपने सबसे बड़े संकटमोचक की ओर देखा—"बीरबल! क्या मुग़ल सल्तनत इस खाली घड़े के सामने हार मान लेगी?"
बीरबल की मोहलत और कद्दू के खेत का रहस्य: बीरबल अपनी जगह से मुस्कुराते हुए उठे। उन्होंने उस खाली घड़े को उठाया और दूत से कहा: "दूत महोदय! आपके महाराज की मांग बिल्कुल जायज़ है। हमारे मुग़ल दरबार में 'बुद्धि' की कोई कमी नहीं है। परंतु, हमारे यहाँ जो बुद्धि पैदा होती है, उसे उगने और पकने में थोड़ा समय लगता है। मुझे ठीक एक महीने का वक़्त चाहिए। एक महीने बाद, यह घड़ा बुद्धि से लबालब भरा होगा।"
दूत ने चुनौती स्वीकार कर ली और वह अतिथि गृह में ठहर गया।
उसी दिन शाम को, बीरबल वह खाली घड़ा लेकर आगरा के बाहरी हिस्से में एक किसान के खेत में पहुँचे। उस खेत में 'कद्दू' (कुम्हड़ा) की बेलें उगी हुई थीं।
बीरबल ने पूरी बेल की सावधानी से जांच की और एक ऐसा कद्दू का फूल चुना, जिसमें अभी-अभी एक बिल्कुल छोटा सा, चने के दाने के बराबर कद्दू का फल निकलना शुरू हुआ था। बीरबल ने उस मिट्टी के घड़े को उस छोटे से कद्दू के ऊपर इस तरह उल्टा करके रख दिया कि वह छोटा कद्दू घड़े के छोटे से मुँह के रास्ते अंदर चला गया, परंतु बेल बाहर ही रही।
बीरबल ने किसान को हिदायत दी कि वह इस घड़े को बिल्कुल न हिलाए और बेल को रोज़ पानी देता रहे।
एक महीने बाद का परिणाम: दिन बीतते गए। बेल से पोषण पाकर वह छोटा सा कद्दू घड़े के अंदर ही अंदर बड़ा होने लगा। चूंकि कद्दू बाहर नहीं निकल सकता था, इसलिए उसने घड़े के अंदर ही अपना आकार बढ़ाना शुरू कर दिया।
ठीक एक महीने बाद, बीरबल खेत में पहुँचे। उन्होंने देखा कि कद्दू पूरी तरह से बड़ा हो चुका है और उसने उस घड़े को अंदर से पूरी तरह (100%) भर दिया है। कद्दू घड़े के अंदर बुरी तरह फंस चुका था।
बीरबल ने बड़ी सावधानी से उस कद्दू की बेल (डंठल) को काट दिया। अब उनके पास एक ऐसा घड़ा था जिसके अंदर एक विशाल कद्दू फंसा हुआ था, जो घड़े के छोटे मुँह से बाहर नहीं आ सकता था।
दीवान-ए-खास में 'बुद्धि' का प्रदर्शन: अगली सुबह, बीरबल उस घड़े को मखमली कपड़े से ढककर दीवान-ए-खास में ले आए। लंका का दूत और शहंशाह अकबर बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।
बीरबल ने दूत के सामने कपड़ा हटाया और वह घड़ा दूत के हाथों में सौंप दिया। दूत ने जैसे ही घड़े के मुँह से अंदर झांका, वह हक्का-बक्का रह गया। घड़े के अंदर एक विशालकाय चीज़ फंसी हुई थी जिसने घड़े को खचाखच भर दिया था।
बीरबल ने अत्यंत शालीनता और व्यंग्य के साथ कहा: "दूत महोदय! लीजिए, मुग़ल सल्तनत का यह 'बुद्धि का घड़ा' तैयार है। हमने इसमें इतनी ठोस बुद्धि भर दी है कि अब इसमें तिल रखने की भी जगह नहीं है।"
दूत ने कहा, "यह तो ठीक है बीरबल, परंतु मैं इसे बाहर कैसे निकालूँ?"
बीरबल ने अपनी कूटनीतिक चाल चलते हुए कहा: "यही तो मुग़ल सल्तनत की शर्त है! आप इसे अपने महाराज के पास ले जाइए और उनसे कहिए कि वे मुग़ल सल्तनत की इस 'बुद्धि' का इस्तेमाल खुशी से करें। परंतु ध्यान रहे... इस बुद्धि को निकालते समय न तो घड़ा टूटना चाहिए, और न ही यह बुद्धि (कद्दू) कटनी चाहिए! जैसे हमने बिना घड़े को तोड़े इसे अंदर डाला है, वैसे ही आप इसे बिना काटे बाहर निकालें!"
अकबर का अट्टहास और दूत की हार: दूत समझ गया कि वह पूरी तरह से बीरबल के जाल में फंस चुका है। बिना घड़ा फोड़े या कद्दू को काटे, उसे बाहर निकालना भौतिक रूप से असंभव था। बीरबल ने एक असंभव शर्त का जवाब एक दूसरी असंभव शर्त से दे दिया था।
दूत ने अपना सिर झुका लिया और कहा, "जहाँपनाह! मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ। लंका नरेश ने सच ही सुना था, बीरबल की बुद्धि को किसी घड़े या पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता।"
शहंशाह अकबर का गगनभेदी अट्टहास पूरे दरबार में गूंज उठा। उन्होंने अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए बीरबल को सोने की मोहरों से तौल दिया और इस तरह आगरा के कद्दू ने लंका की कूटनीति को मात दे दी।
(यह कहानी इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि 'जैसा सवाल, वैसा ही जवाब' देना एक श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ की पहचान है।
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