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👑 अकबर-बीरबल

शहंशाह का तोता — मौत का फरमान और बुरी खबर सुनाने की कला

लोक परंपरा — अकबर-बीरबल5 मिनट का पठन
शहंशाह का तोता — मौत का फरमान और बुरी खबर सुनाने की कला

शहंशाह अकबर को कला और साहित्य के साथ-साथ दुर्लभ पशु-पक्षियों का भी बहुत शौक था। एक बार, ईरान के एक व्यापारी ने शहंशाह को एक अत्यंत सुंदर और अक्लमंद 'तोता' तोहफे में दिया। यह तोता इंसानों की तरह साफ़ आवाज़ में बोल सकता था और कई भाषाओं के शब्द जानता था।

अकबर को वह तोता इतना पसंद आया कि उन्होंने उसे एक सोने के पिंजरे में रखा और उसकी देखभाल के लिए एक विशेष सेवक (खादिम) को नियुक्त कर दिया। तोते को रोज़ ताज़े फल, मेवे और साफ पानी दिया जाता था।

अहंकार से भरा शाही फरमान: एक दिन तोते से खेलते हुए शहंशाह के मन में उस पक्षी के प्रति इतना मोह जाग गया कि उन्होंने भरे दरबार में एक बहुत ही अजीब और खौफनाक शाही फरमान सुना दिया।

अकबर ने गरजते हुए कहा: "यह तोता मुझे मेरी जान से भी प्यारा है। यदि किसी भी कारण से इस तोते को कुछ हुआ, तो खैर नहीं! और कान खोलकर सुन लो... जो भी शख्स मुझे इस तोते के मरने की मनहूस खबर सुनाएगा, उसी वक़्त उसका सिर धड़ से अलग (कलम) कर दिया जाएगा!"

सेवक यह सुनकर कांप गया, परंतु राजा का हुक्म था, सो वह चुपचाप तोते की देखभाल करता रहा।

तोते की मौत और सेवक का खौफ: दिन बीतते गए। सर्दियां आ चुकी थीं। एक सुबह, जब सेवक तोते को फल खिलाने के लिए पिंजरे के पास पहुँचा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वह सुंदर तोता पिंजरे के फर्श पर गिरा हुआ था। उसका शरीर अकड़ चुका था और उसमें जान नहीं थी। तोता मर चुका था!

सेवक के पसीने छूटने लगे। वह बुरी तरह फंस चुका था। यदि वह शहंशाह को जाकर तोते की मौत की खबर सुनाता है, तो फरमान के अनुसार उसका सिर काट दिया जाएगा। और यदि वह यह बात छिपाता है और शहंशाह को खुद पता चलता है, तो गद्दारी के जुर्म में भी उसे मौत ही मिलेगी। मौत दोनों तरफ से निश्चित थी।

रोता-बिलखता वह गरीब सेवक सीधा बीरबल के घर पहुँचा और उनके पैरों में गिरकर अपनी जान की भीख मांगने लगा। बीरबल ने उसे शांत किया और कहा, "घबराओ मत, तुम दरबार में चलो। शहंशाह को यह खबर मैं दूँगा, और तुम्हारी जान पर कोई आंच नहीं आएगी।"

बीरबल का कूटनीतिक संवाद (बुरी खबर सुनाने की कला): बीरबल और वह सेवक दीवान-ए-खास में पहुँचे। शहंशाह अकबर अपने तख्त पर बैठे थे।

बीरबल ने अत्यंत गंभीर और दुखी चेहरा बनाते हुए शहंशाह को सलाम किया। अकबर ने पूछा, "क्या बात है बीरबल? आज तुम इतने उदास क्यों लग रहे हो? सब खैरियत तो है?"

बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह! बात आपके उस ईरानी तोते की है..."

'तोते' का नाम सुनते ही अकबर चौकन्ने हो गए। उन्होंने घबराकर पूछा, "क्या हुआ मेरे तोते को? वह ठीक तो है?"

बीरबल ने अत्यंत शांत और सूफी अंदाज़ में कहा: "हुज़ूर! आपका तोता आज एक बहुत ही गहरे 'ध्यान' में चला गया है। वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठ चुका है। न तो वह कुछ खा रहा है, और न ही पानी पी रहा है। उसने अपनी आंखें पूरी तरह से मूंद ली हैं। न वह अपने पंख फड़फड़ा रहा है, न ही कुछ बोल रहा है। बस एकदम शांत और स्थिर लेटा हुआ है, जैसे उसने दुनिया से नाता तोड़ लिया हो!"

बादशाह का गुस्सा और सच्चाई का सामना: बीरबल की यह घुमावदार बातें सुनकर अकबर का धैर्य जवाब दे गया। वे गुस्से में अपने तख्त से उठे और बोले, "यह तुम क्या पहेलियां बुझा रहे हो? चलो, मुझे अभी उस तोते के पास ले चलो!"

अकबर, बीरबल और सभी दरबारी भागते हुए उस कमरे में पहुँचे जहाँ पिंजरा रखा था। अकबर ने जैसे ही पिंजरे के भीतर देखा, उन्हें सच्चाई समझ में आ गई। तोता मरा पड़ा था।

दुख और गुस्से से भरे अकबर ने बीरबल की ओर पलटकर ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा: "अरे बीरबल! तुम भी कैसी बेवकूफी की बातें कर रहे थे? सीधा-सीधा यह क्यों नहीं कह दिया कि 'तोता मर गया है'?"

बीरबल का अचूक पलटवार और जान की सलामती: बीरबल ने तुरंत अपना सिर झुकाया और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा: "गुस्ताखी माफ़ जहाँपनाह! परंतु आप खुद ही सोचिए, आपका फरमान क्या था? आपने कहा था कि जो भी शख्स आपको तोते के मरने की खबर सुनाएगा, उसका सिर कलम कर दिया जाएगा।"

बीरबल ने आगे कहा: "हुज़ूर! मैंने तोते की हालत बताई, परंतु उसके मरने की बात मेरे मुँह से नहीं निकली। तोते के 'मरने' की बात तो अभी-अभी स्वयं आपके मुँह से निकली है! अब मुग़ल सल्तनत का फरमान क्या कहता है? क्या शहंशाह अपना ही सिर कलम करवाएंगे?"

अहंकार का टूटना: यह हाज़िरजवाबी सुनकर अकबर एकदम सन्न रह गए। उनका सारा गुस्सा शांत हो गया और उन्हें अपने उस बेतुके और अहंकारी फरमान पर शर्मिंदगी महसूस हुई। कोई भी इंसान मौत जैसी प्राकृतिक चीज़ को नहीं रोक सकता, चाहे वह शहंशाह ही क्यों न हो।

अकबर ने बीरबल की पीठ थपथपाई और कहा, "तुमने आज फिर मेरी आंखें खोल दीं बीरबल। एक राजा को कभी ऐसा फरमान नहीं देना चाहिए जो कुदरत के नियमों के खिलाफ हो।"

अकबर ने उस गरीब सेवक को माफ कर दिया और बीरबल को कड़वे सच को इतनी मिठास और कूटनीति से पेश करने के लिए भारी इनाम दिया।

🎉 कहानी समाप्त

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