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चार अंधे और हाथी

लोक परंपरा — भारतीय लोककथा6 मिनट का पठन
चार अंधे और हाथी

एक गाँव में चार बहुत ही पक्के दोस्त रहते थे। इत्तेफाक की बात यह थी कि वे चारों के चारों 'जन्म से अंधे' थे। उन्होंने दुनिया की कोई भी चीज़ अपनी आँखों से नहीं देखी थी। वे चीज़ों को सिर्फ 'छूकर' और महसूस करके ही उनके बारे में अंदाज़ा लगाते थे।

उन्होंने लोगों के मुँह से 'हाथी' के बारे में बहुत सुन रखा था। "हाथी बहुत विशाल होता है!" "हाथी बहुत ताक़तवर होता है!" चारों अंधे अक्सर आपस में बहस करते कि आखिर यह 'हाथी' नाम की बला दिखती कैसी होगी?

एक दिन गाँव में किसी राजा की सवारी आई। राजा के काफिले में एक बहुत ही बड़ा और सजा-धजा 'हाथी' भी था।

जब चारों अंधों को पता चला कि गाँव में हाथी आया है, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने महावत से मिन्नतें कीं: "भाई महावत! हमने ज़िंदगी में कभी हाथी नहीं देखा। क्या तुम हमें अपने हाथी को 'छूकर' देखने की इजाज़त दोगे? हम जानना चाहते हैं कि हाथी कैसा होता है।"

महावत बहुत दयालु था। उसने अपना हाथी रोक दिया और कहा, "ठीक है, आ जाओ! लेकिन एक-एक करके आना।"

चारों अंधे लाठियाँ टेकते हुए हाथी के पास पहुँचे।

पहले अंधे ने अपने हाथ आगे बढ़ाए। उसके हाथ हाथी के एक मोटे और भारी 'पैर' पर पड़े। उसने पैर को ऊपर से नीचे तक टटोला और खुशी से चिल्लाया: "अरे वाह! मुझे पता चल गया! हाथी तो बिल्कुल एक बड़े और गोल 'खंभे' जैसा होता है!"

दूसरा अंधा हाथी के पीछे की तरफ खड़ा था। उसके हाथ में हाथी की 'पूँछ' आ गई। उसने पूँछ को पकड़कर हिलाया और ज़ोर से हँसते हुए बोला: "अरे नहीं-नहीं! तुम बिल्कुल गलत कह रहे हो। हाथी खंभे जैसा कहाँ है? हाथी तो बिल्कुल एक लंबी और खुरदरी 'रस्सी' जैसा होता है!"

अब तीसरे अंधे की बारी थी। वह हाथी के बिल्कुल सामने खड़ा था। उसने जैसे ही अपने हाथ आगे बढ़ाए, उसके हाथों में हाथी की लंबी और मोटी 'सूँड़' आ गई। हाथी ने अपनी सूँड़ थोड़ी सी हिलाई। तीसरा अंधा डर के मारे पीछे उछला और चिल्लाया: "अरे बेवकूफ़ो! तुम दोनों का दिमाग खराब हो गया है। न यह खंभा है, न यह रस्सी है। यह तो एक बहुत बड़ा और ज़िंदा 'अजगर' है! हाथी तो साँप जैसा होता है!"

अंत में चौथा अंधा आगे बढ़ा। वह हाथी के कान के पास खड़ा था। उसके हाथों में हाथी का बहुत बड़ा और चपटा 'कान' आ गया, जो हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था। चौथे अंधे ने बड़े ही आत्मविश्वास से कहा: "तुम तीनों एक नंबर के झूठे हो! हाथी न खंभा है, न रस्सी है, न साँप है। मैं इसे अपने हाथों से महसूस कर रहा हूँ। हाथी तो बिल्कुल अनाज साफ़ करने वाले एक बड़े से 'सूप' या 'पंखे' जैसा होता है!"

बस, फिर क्या था! चारों अंधों में भयंकर बहस शुरू हो गई।

"हाथी खंभा है!" "नहीं, हाथी रस्सी है!" "तुम अंधे हो क्या? हाथी अजगर है!" "हाथी पंखा है!"

चारों अपनी-अपनी बात पर इतने अड़ गए कि उनमें हाथापाई और घूँसेबाज़ी शुरू हो गई। वे एक-दूसरे के बाल खींचने लगे और गालियाँ देने लगे।

गाँव के लोग इकट्ठा हो गए और अंधों की यह अजीबोगरीब लड़ाई देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

तभी गाँव का एक बहुत ही समझदार और बूढ़ा आदमी वहाँ से गुज़रा। उसने अंधों को लड़ते देखा तो उन्हें अलग किया। "अरे भाइयो! क्यों लड़ रहे हो?"

चारों अंधों ने एक साथ कहा, "बाबा! आप ही बताइए, हाथी खंभे जैसा होता है ना?" "नहीं बाबा, रस्सी जैसा होता है!"

बूढ़ा आदमी ज़ोर से हँसा और बोला: "मेरे भोले दोस्तो! तुम चारों लड़ना बंद करो। मज़ाक की बात यह है कि तुम चारों ही अपनी-अपनी जगह पर 'बिल्कुल सही' हो, और तुम चारों ही 'बिल्कुल गलत' भी हो!"

अंधे हैरान रह गए। "यह कैसे हो सकता है बाबा?"

बूढ़े आदमी ने समझाया: "जिसने पैर छुआ, उसे हाथी खंभा लगा। जिसने पूँछ छुई, उसे रस्सी लगा। जिसने सूँड़ छुई, उसे साँप लगा और जिसने कान छुआ, उसे हाथी पंखा लगा। तुम चारों ने हाथी के सिर्फ 'एक छोटे से हिस्से' को छुआ और उसी को 'पूरा हाथी' मान लिया! जबकि असलियत में, हाथी इन चारों चीज़ों से मिलकर बना एक बहुत बड़ा जानवर है!"

चारों अंधों को अपनी बेवकूफी का एहसास हुआ। वे शर्मिंदा होकर हँसने लगे और एक-दूसरे के गले लग गए। इस हास्य लोककथा ने दुनिया को यह बहुत बड़ा सबक दिया कि हर इंसान दुनिया को सिर्फ अपने 'नज़रिए' से देखता है, और उसे ही पूरा सच मान बैठता है!

🎉 कहानी समाप्त

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