मोटा सेठ और दुबला नौकर

एक गाँव में एक 'सेठ जी' रहते थे। सेठ जी बहुत अमीर थे, लेकिन उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में मक्खी चूसने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं किया था। वे इतने ज़्यादा मोटे थे कि उनका पेट एक बड़े मटके जैसा लगता था।
सेठ जी ने घर के काम के लिए एक 'नौकर' रखा, जिसका नाम था 'रामू'। रामू बेचारा बहुत ही दुबला-पतला था, लेकिन उसका दिमाग बहुत तेज़ चलता था।
सेठ जी की कंजूसी की हद यह थी कि वे दिन भर रामू से गधों की तरह काम करवाते, लेकिन खाने के नाम पर उसे सिर्फ दो 'सूखी रोटियाँ' और थोड़ा सा गुड़ देते थे।
एक दिन रामू ने सूखी रोटी चबाते-चबाते सेठ जी से कहा: "मालिक! मैं दिन भर इतनी मेहनत करता हूँ। ये सूखी रोटियाँ गले से नीचे नहीं उतरतीं। अगर आप कटोरी में ज़रा सा 'घी' या दाल दे दें, तो मैं रोटी डुबोकर खा लूँ।"
मोटे सेठ जी ने अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए एक बहुत ही 'कंजूस और दार्शनिक' तर्क दिया। सेठ जी ने सामने शेल्फ पर रखे 'घी के डिब्बे' की तरफ इशारा करते हुए कहा: "अरे रामू! इंसान का पेट तो बस एक धोखा है। घी खाने से क्या होता है? असली चीज़ तो 'मन की संतुष्टि' है! तू ऐसा कर... रोटी का एक टुकड़ा तोड़, उसे दूर से ही 'घी के डिब्बे' की तरफ दिखा, मन ही मन सोच कि तूने रोटी घी में डुबो ली है, और फिर उसे खा ले! तुझे बिल्कुल घी का स्वाद आएगा। मैं भी ऐसे ही पैसे बचाता हूँ!"
रामू सेठ जी की इस भयानक कंजूसी पर खून का घूँट पीकर रह गया। उसने तय किया कि वह इस मोटे सेठ को इसी की भाषा में ऐसा मज़ा चखाएगा कि सेठ ज़िंदगी भर याद रखेगा।
अगले दिन सेठ जी ने रामू को बुलाया। "रामू! मुझे गाँव के ज़मींदार को कुछ ज़रूरी कागज़ात देने हैं। यह गाँव यहाँ से दस कोस (लगभग 30 किलोमीटर) दूर है। तू अभी पैदल निकल जा और शाम तक कागज़ देकर वापस आ जाना।"
रामू ने हाथ जोड़कर कहा, "जी मालिक! लेकिन दस कोस जाना और दस कोस आना, यानी बीस कोस का सफर है। रास्ते में मुझे भूख-प्यास लगेगी। आप मुझे रास्ते के खर्च के लिए कुछ पैसे (सिक्के) दे दीजिए ताकि मैं कुछ खा सकूँ।"
सेठ जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने फिर से कंजूसी का ज्ञान देना शुरू किया: "पैसे? अरे रामू! पैसे लेकर तो कोई भी बेवकूफ़ बाज़ार से खाना खरीद कर खा सकता है! 'असली और होशियार' नौकर तो वह होता है, जो बिना एक भी पैसा खर्च किए, खाली हाथ जाए और अपना पेट भरकर वापस आ जाए! अगर तू एक सच्चा और होशियार नौकर है, तो बिना पैसों के जा कर दिखा!"
रामू ने मुस्कुराते हुए सिर झुकाया। "जी मालिक! आपने बिल्कुल सही कहा। मैं समझ गया।" रामू बिना एक भी पैसा लिए, खाली हाथ उस लंबे सफर पर निकल गया।
रामू पूरे दिन गायब रहा और शाम ढलने के बाद वापस लौटा। वह बहुत थका हुआ नाटक कर रहा था।
रात का समय था। सेठ जी की खाने की मेज़ सज चुकी थी। सेठ जी को बहुत तेज़ भूख लगी थी।
सेठ जी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "अरे रामू! जल्दी से मेरा खाना परोस! आज तो मेरे पेट में चूहे कूद रहे हैं। क्या-क्या बनाया है आज?"
रामू दौड़ता हुआ रसोई से आया। उसके दोनों हाथों में 'चाँदी की एक बहुत बड़ी और भारी थाली' थी। उस थाली के ऊपर एक बहुत ही शानदार मखमली कपड़ा ढका हुआ था।
रामू ने बहुत ही अदब से वह बड़ी सी थाली सेठ जी के सामने मेज़ पर रख दी।
सेठ जी की आँखों में चमक आ गई। "वाह रामू! लगता है आज तूने बहुत ही छप्पन भोग बनाए हैं।"
सेठ जी ने उत्सुकता से थाली के ऊपर से वह मखमली कपड़ा हटाया। लेकिन कपड़ा हटाते ही सेठ जी के होश उड़ गए!
चाँदी की वह पूरी की पूरी थाली बिल्कुल 'खाली' थी! उसमें खाने का एक दाना भी नहीं था!
सेठ जी गुस्से से पागल हो गए। वे अपनी कुर्सी से उछल पड़े और चिल्लाए: "अरे मूर्ख! बदतमीज़! यह क्या मज़ाक है? यह थाली तो बिल्कुल खाली है! मेरा खाना कहाँ है?"
रामू बिल्कुल शांत खड़ा रहा। उसने हाथ जोड़े और बहुत ही मासूमियत से, सेठ जी के ही 'कंजूस दर्शन' का इस्तेमाल करते हुए कहा:
"मालिक! भरा हुआ खाना तो दुनिया का कोई भी बेवकूफ़ और साधारण सेठ खा सकता है! 'असली और होशियार सेठ' तो वह होता है, जो बिल्कुल 'खाली थाली' को देखकर ही अपना पेट भर ले!"
सेठ जी का मुँह खुला का खुला रह गया।
रामू इतने पर ही नहीं रुका। उसने आगे कहा: "मालिक! आप थाली की तरफ गौर से देखिए... मन ही मन सोचिए कि इस खाली थाली में गरमा-गरम पूड़ियाँ, रसमलाई और शाही पनीर रखा है... और अपने 'मन की संतुष्टि' से उसे खा लीजिए! आपको बिल्कुल असली खाने का स्वाद आएगा!"
मोटे सेठ जी को अपना ही फेंका हुआ जाल अपने ऊपर भारी पड़ता हुआ नज़र आया। घी के डिब्बे और बिना पैसों के सफर वाली बात सेठ जी के दिमाग में गूँजने लगी।
सेठ जी समझ गए कि इस दुबले नौकर ने उनकी कंजूसी का बहुत ही करारा और हास्यपूर्ण 'इलाज' कर दिया है।
सेठ जी ने शर्म से सिर झुका लिया। उन्होंने अपनी तिजोरी की चाबी निकाली, रामू को पैसे दिए और कहा, "मुझे माफ़ कर दे भाई! मेरी अक्ल ठिकाने आ गई है। जा, बाज़ार से हम दोनों के लिए बढ़िया खाना और 'असली घी' लेकर आ!"
उस दिन के बाद से सेठ जी ने कभी कंजूसी की बातें नहीं कीं और रामू को हर दिन छक कर भरपेट खाना मिलने लगा!
😄 हास्य कहानियाँ की और कहानियाँ
अंधेर नगरी चौपट राजा
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की अमर व्यंग्य कथा — जहाँ सब कुछ 'टके सेर' मिलता था। एक लालची चेला मिठाई के लालच में रुक गया और जब फाँसी की बारी आई, तो गुरु की चतुराई ने उसे बचाया और उस मूर्ख राजा को उसके अपने जाल में फँसा दिया।
पढ़ें →हर कण में भगवान
हाथी और महावत की मशहूर और गुदगुदाने वाली कथा — एक भोले शिष्य ने गुरु का ज्ञान इतना शाब्दिक रूप से लिया कि पागल हाथी के सामने से हटने से मना कर दिया। काँटों में फेंके जाने के बाद गुरु जी का जवाब सुनकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया।
पढ़ें →भोलाराम का जीव
हरिशंकर परसाई जी का सरकारी दफ्तरों पर करारा व्यंग्य — भोलाराम मर गया पर उसका जीव स्वर्ग नहीं पहुँचा। नारद मुनि उसे ढूँढने पृथ्वी पर आए तो पता चला कि आत्मा पेंशन की धूल भरी सरकारी फाइलों में अटकी हुई है!
पढ़ें →इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर
हरिशंकर परसाई जी का पुलिस व्यवस्था पर अद्भुत व्यंग्य — भारत सरकार ने चाँद पर वैज्ञानिक नहीं, इंस्पेक्टर मातादीन को भेजा। मातादीन ने चाँद पर पृथ्वी की पुलिस व्यवस्था लागू की और चाँद वालों ने उन्हें वापस भेजने के लिए भारत से गुहार लगाई।
पढ़ें →बड़े भाई साहब
मुंशी प्रेमचंद की बचपन और पढ़ाई की मीठी नोकझोंक पर आधारित क्लासिक कथा — बड़े भाई साहब दिन-रात पढ़कर भी फेल होते थे और छोटा भाई खेलकर भी पास। फिर भी भाई साहब की डांट में जो प्यार और अनुभव की गहराई थी, वह किताबों में नहीं मिलती।
पढ़ें →निमंत्रण — पंडित मोटेराम शास्त्री का पेटूपन
मुंशी प्रेमचंद का दावत और ब्राह्मणों के पेटूपन पर ज़बरदस्त व्यंग्य — पंडित मोटेराम शास्त्री ने सेठ जी की दावत में इतने रसगुल्ले खा लिए कि झुककर दक्षिणा भी नहीं उठा सके। फिर पैरों के अँगूठों से सोने का सिक्का उठाने की जो तरकीब निकाली, वह देखने वाली थी।
पढ़ें →