चाचा छक्कन की ऐनक (चश्मा)

चाचा छक्कन की उम्र अब थोड़ी ढलने लगी थी, इसलिए नज़दीक का काम करने या अखबार पढ़ने के लिए उन्हें 'ऐनक' की ज़रूरत पड़ती थी। लेकिन उनकी याददाश्त इतनी कमज़ोर थी कि वे ऐनक रखकर भूल जाते और फिर पूरे घर में 'महाभारत' शुरू हो जाती।
एक दिन सुबह-सुबह का वक्त था। चाचा छक्कन दालान में बैठकर अपना अखबार पढ़ रहे थे। चची रसोई में नाश्ता बना रही थीं और बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे।
अचानक बाहर से डाकिए ने एक खत फेंका। चाचा जी ने अखबार नीचे रखा, अपनी ऐनक उतारी और खत उठाने के लिए दरवाज़े की तरफ गए।
खत किसी रिश्तेदार का था। चाचा जी खत लेकर वापस अपनी कुर्सी पर आए। "अरे! मेरी ऐनक कहाँ है? अभी तो यही रखी थी!" चाचा जी ने अपनी कुर्सी के आस-पास हाथ मारते हुए कहा।
"लल्लू! ओ लल्लू! ज़रा दौड़ कर आ! मेरी ऐनक ढूँढ!"
लल्लू दौड़ता हुआ आया। उसने मेज़, कुर्सी और ज़मीन पर देखा, लेकिन ऐनक कहीं नज़र नहीं आई।
"चाचा जान! ऐनक तो यहाँ नहीं है।" "यहाँ नहीं है तो क्या ज़मीन खा गई उसे? इस घर में कोई इंसान चैन से एक खत भी नहीं पढ़ सकता। जो चीज़ जहाँ रखता हूँ, वह वहाँ से गायब हो जाती है। तुम सब के सब चोर हो!"
अब चाचा जी की आवाज़ पूरे घर में गूँजने लगी। चची रसोई से बाहर आईं। "क्या हुआ? सुबह-सुबह क्यों घर सिर पर उठा रखा है?"
चाचा जी ने खत हवा में लहराते हुए कहा, "तुम्हारी इस फौज ने मेरी ऐनक गायब कर दी है! अभी एक सेकंड पहले यहीं मेज़ पर रखी थी। तुम लोग जानबूझकर मुझे परेशान करते हो ताकि मैं खत न पढ़ सकूँ।"
चची ने एक ठंडी साँस ली। "आप भी कैसे इंसान हैं। खुद चीज़ें रखकर भूल जाते हैं और इल्ज़ाम हम पर लगाते हैं। ढूँढती हूँ मैं।"
अब पूरा घर ऐनक ढूँढने में लग गया। लल्लू ने कालीन के नीचे देखा। मुन्ने ने तकियों के गिलाफ (Covers) चेक किए। चची ने मेज़ की दराज़ छानी। लेकिन ऐनक कहीं नहीं मिली।
चाचा जी बीच-बीच में ताने मार रहे थे: "हाँ-हाँ! और ढूँढो! तुम लोगों ने उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया होगा! मैं तो कहता हूँ कि इस घर में एक 'सीआईडी' (CID) वाला रख लेना चाहिए, जो मेरी चीज़ों की रखवाली करे।"
पंद्रह मिनट हो गए। आधा घंटा हो गया। बच्चे स्कूल के लिए लेट हो रहे थे। चची का नाश्ता जल रहा था, लेकिन चाचा जी ने हुक्म दे रखा था कि जब तक ऐनक नहीं मिलेगी, कोई घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।
तभी चची ने तंग आकर कहा, "ज़रा सोचिए तो सही, जब आप खत उठाने गए थे, तो क्या आप ऐनक साथ ले गए थे?"
चाचा जी ने आँखें तरेरते हुए कहा, "मैं क्या कोई बेवकूफ़ हूँ जो खत उठाने के लिए ऐनक साथ ले जाऊँगा? मैंने ऐनक यहीं उतारी थी... और... और फिर मैं दरवाज़े तक गया... और..."
चाचा जी की आवाज़ अचानक धीमी हो गई। उनके दिमाग में एक पुरानी तस्वीर कौंधी।
चाचा जी ने अपना हाथ धीरे से अपनी 'शेरवानी की सामने वाली जेब' पर रखा। जेब के अंदर कुछ कड़क और गोल सा महसूस हुआ!
चाचा जी की आँखें फटी रह गईं। उनकी वह गायब 'ऐनक', उनकी अपनी ही शेरवानी की जेब में बड़े आराम से बैठी हुई थी! जब वे खत उठाने गए थे, तो उन्होंने 'सुरक्षा' के खयाल से ऐनक को अपनी जेब में डाल लिया था और फिर यह बात बिल्कुल भूल गए थे।
अब चाचा जी धर्मसंकट में फँस गए। अगर वे अभी ऐनक जेब से निकाल लेते, तो चची और बच्चे उनका बहुत मज़ाक उड़ाते। उनकी सारी हेकड़ी हवा हो जाती।
चाचा जी का खुराफाती दिमाग तेज़ी से दौड़ा। उन्हें अपनी इज़्ज़त बचानी थी।
उन्होंने बहुत ही 'शातिर' तरीके से अपना बायाँ हाथ शेरवानी की जेब में डाला। धीरे से ऐनक को मुट्ठी में बंद किया। फिर उन्होंने अपनी कुर्सी के नीचे पड़े हुए उस अखबार को ज़मीन से उठाने का नाटक किया।
जैसे ही वे अखबार उठाने के लिए नीचे झुके, उन्होंने बड़ी ही चालाकी से अपनी मुट्ठी में दबी वह 'ऐनक', अखबार के ठीक 'नीचे' ज़मीन पर खिसका दी!
और फिर अचानक, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा खज़ाना ढूँढ लिया हो, वे ज़ोर से चिल्लाए:
"अरे मिल गई! मिल गई ऐनक! यहाँ ज़मीन पर, अखबार के नीचे दबी हुई थी!"
पूरा घर दौड़ कर वहाँ आया। चाचा जी ज़मीन से ऐनक उठा रहे थे और उनके चेहरे पर एक 'झूठा गुस्सा' था।
चाचा जी ने चची को डांटते हुए कहा: "देख लिया? तुम्हारी आँखों पर चर्बी चढ़ी हुई है। तुम लोग एक नंबर के अंधे हो! पूरे घर को सिर पर उठा लिया और ऐनक यहीं मेरे पैरों के पास, इस अखबार के नीचे आराम से लेटी हुई थी। तुम में से किसी की भी नज़र इस पर नहीं पड़ी! अगर मैं खुद न ढूँढता, तो यह ऐनक आज टूट ही जाती। अब जाओ, अपना-अपना काम करो!"
चची और बच्चे बहुत ही शर्मिंदा और हैरान थे कि ऐनक अखबार के नीचे कैसे आ गई। वे सिर झुकाए अपने-अपने काम पर लग गए।
और चाचा छक्कन, अपनी शेरवानी ठीक करते हुए, अपनी उस 'शानदार एक्टिंग' और 'चोरी' पर मन ही मन मुस्कुराते हुए, बड़े मज़े से अपना खत पढ़ने लगे!
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