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चाचा छक्कन का बुखार

हिंदी हास्य साहित्य — चाचा छक्कन7 मिनट का पठन
चाचा छक्कन का बुखार

चाचा छक्कन वैसे तो बहुत हट्टे-कट्टे थे, लेकिन 'वहम' की बीमारी उन्हें बहुत भयंकर थी। अगर उन्हें कोई हल्की सी छींक भी आ जाती, तो वे उसे 'निमोनिया' समझ लेते थे। अगर पेट में थोड़ा दर्द होता, तो वे 'हैज़ा' (Cholera) मानकर बिस्तर पकड़ लेते थे।

गर्मियों के दिन थे। एक दिन सुबह-सुबह चाचा छक्कन नहाकर निकले, तो उन्हें हल्की सी ठंड लगी और उन्होंने दो-तीन बार ज़ोर से 'छींक' दिया— 'आच्छूँ... आच्छूँ!'

बस, इतना होना था कि चाचा जी का दिमाग दौड़ने लगा। उन्होंने अपना हाथ अपने माथे पर रखा। उन्हें अपना माथा थोड़ा गर्म लगा (जो कि नहाने के बाद आम बात थी)।

चाचा जी लड़खड़ाते हुए कदमों से अपने कमरे में गए और चारपाई पर 'धड़ाम्' से ऐसे गिरे जैसे किसी ने उन्हें गोली मार दी हो।

उन्होंने कराहते हुए आवाज़ लगाई, "अरी ओ मुन्ने की माँ! दौड़ कर आ! मैं तो गया!"

चची घबराकर रसोई से दौड़ी-दौड़ी आईं, "क्या हुआ? क्या हुआ?"

चाचा जी ने आँखें बंद कर लीं और बहुत ही धीमी, कमज़ोर आवाज़ (नाटक करते हुए) में बोले, "मुझे बहुत ज़ोर का बुखार चढ़ गया है। मेरा पूरा बदन टूट रहा है। लगता है मेरा आखिरी समय आ गया है। बच्चों को बुला लो।"

चची ने चाचा जी के माथे पर हाथ रखा। माथा बिल्कुल सामान्य था, कोई बुखार नहीं था। चची ने झुँझलाते हुए कहा, "अरे कहाँ का बुखार? माथा तो बिल्कुल ठंडा है। बस दो छींकें ही तो आई हैं। उठिए और नाश्ता कर लीजिए।"

चाचा जी को चची की यह 'लापरवाही' बहुत बुरी लगी। "तुम्हें क्या पता? थर्मामीटर मेरे अंदर है या तुम्हारे अंदर? मुझे अंदर से हड्डी-हड्डी में ठंड लग रही है। लल्लू! जा और मेरे ऊपर 'दो भारी वाली रज़ाइयाँ' डाल दे!"

बाहर चिलचिलाती धूप और भयानक गर्मी थी, और चाचा छक्कन कमरे में दो मोटी-मोटी सर्दियों वाली रज़ाइयाँ ओढ़कर लेट गए। गर्मी के मारे उनके पसीने छूट रहे थे, लेकिन वहम के कारण वे रज़ाई से बाहर नहीं निकले।

"खिड़कियाँ बंद कर दो! हवा आ रही है! मुझे ठंड लग जाएगी!" चाचा जी ने रज़ाई के अंदर से मुँह निकाल कर हुक्म दिया।

कमरे की सारी खिड़कियाँ बंद कर दी गईं। कमरा ओवन की तरह तपने लगा।

चाचा जी लगातार कराह रहे थे— "हाय अल्लाह! मेरी कमर! हाय मेरा सिर! मैं नहीं बचूँगा!"

उन्होंने पूरे घर के बच्चों को अपने बिस्तर के पास इकट्ठा कर लिया। चाचा जी ने बहुत ही भावुक होकर अपनी 'वसीयत' सुनानी शुरू कर दी।

"देखो मुन्ने! मेरे मरने के बाद अपनी माँ को तंग मत करना। और लल्लू, तुम उस बड़े वाले संदूक की चाबी सँभाल कर रखना। मेरी जो शेरवानी है, वह तुम पहन लेना। और हाँ... मेरी कलाई घड़ी बड़े बेटे को दे देना..."

बच्चे सचमुच डर कर रोने लगे। चची को भी अब थोड़ी चिंता होने लगी कि कहीं सच में इन्हें कुछ हो तो नहीं गया।

चची ने नौकर से कहा, "जाओ, जल्दी से 'हकीम साहब' को बुला लाओ!"

आधे घंटे बाद हकीम साहब अपना बैग लेकर पहुँचे। उन्होंने देखा कि गर्मी के मौसम में खिड़कियाँ बंद हैं और चाचा छक्कन दो रज़ाइयाँ ओढ़े पसीने में तर-बतर कराह रहे हैं।

हकीम साहब ने चाचा जी के माथे पर हाथ रखा। फिर उनकी नब्ज़ चेक की। उन्होंने आँखें खोलकर देखीं और जीभ भी चेक की।

हकीम साहब मुस्कुराए। उन्होंने चची की तरफ देखा और कहा, "घबराने की कोई बात नहीं है।"

चाचा जी ने रज़ाई के अंदर से ही आँखें तरेरते हुए हकीम साहब से कहा, "हकीम जी! सच-सच बताइए, मुझे कौन सी भयानक बीमारी है? क्या यह मलेरिया है या टाइफाइड? मैं कितनी देर का मेहमान हूँ?"

हकीम साहब एक बहुत ही अनुभवी और मज़ाकिया इंसान थे। वे चाचा छक्कन का वहम समझ चुके थे।

हकीम साहब ने बहुत ही 'गंभीर' आवाज़ बनाते हुए कहा: "छक्कन साहब! मामला बहुत संगीन है। आपको एक बहुत ही 'खतरनाक किस्म का बुखार' हुआ है। इसका नाम है— 'वहम-ए-नामुराद' (बेवजह का वहम)!"

चाचा जी चौंके, "यह कौन सी बीमारी है हकीम जी? इसका इलाज क्या है?"

हकीम साहब ने तुरंत नौकर को आदेश दिया, "लल्लू! सबसे पहले ये दोनों रज़ाइयाँ इनके ऊपर से हटाओ!" रज़ाइयाँ हटा दी गईं।

"अब कमरे की सारी खिड़कियाँ खोल दो ताकि ताज़ी हवा आए!" खिड़कियाँ खोल दी गईं।

हकीम साहब ने अपनी दवाई की पेटी से एक 'चूर्ण' (पाचन की पुड़िया) निकाला और चाचा जी को देते हुए कहा: "और इसका सबसे बड़ा इलाज यह है कि आप अभी बिस्तर से उठिए, मुँह-हाथ धोइए और जाकर रसोई में गरमा-गरम पराठे और चाय खाइए! क्योंकि आपको बुखार-वुखार कुछ नहीं है, बस भूख के मारे आपके पेट में गैस बन गई थी, जो दिमाग पर चढ़ गई और आपको छींक आ गई!"

यह सुनते ही चची और बच्चे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

चाचा छक्कन का सारा 'बुखार' और मरने का नाटक एक पल में हवा हो गया। वे शर्मिंदा होकर बिस्तर से उठे और बुड़बुड़ाते हुए बोले: "आजकल के हकीमों को कुछ नहीं आता! मरीज मरने वाला होता है और इन्हें भूख की बीमारी लगती है!" और यह कहते हुए चाचा जी अपना वहम भूलकर सीधे रसोई की तरफ नाश्ता करने चले गए।

🎉 कहानी समाप्त

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